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मनुष्यता और प्रतिरोध की संस्कृति की पहचान है समकालीन कविता

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 9/11/2019 12:47:43 PM
मनुष्यता और प्रतिरोध की संस्कृति की पहचान है समकालीन कविता

रिपब्लिक डेस्क: समकालीन कविता मनुष्यता और प्रतिरोध की संस्कृति की पहचान है. पश्चिम बंगाल के हावड़ा में विद्यार्थी मंच की ओर से साहित्यिक पत्रिका मुक्तांचल के प्रकाशन के अवसर पर आयोजित विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक प्रो शंभुनाथ ने ये बातें कहीं. उन्होंने कहा कि समकालीन कविता ने हमें वैचारिक रूप से प्रभावित किया है. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आलोचक रविभूषण ने कहा कि आज के समय में समकालीन कविता की प्रासंगिकता बढ़ गई है.

समकालीन कविता ने हमें वैचारिक रूप से प्रभावित किया है. इस अवसर पर विद्यासागर विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष प्रो दामोदर मिश्र ने कहा कि समकालीन कविता के केंद्र में सामाजिक सरोकारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता है. इस समय का  काव्य शिल्प वैविध्यपूर्ण है. समकालीन कविता में अपने समय के बदलावों को पकड़ने की  गहरी बेचैनी है. प्रो. विभा कुमारी ने कहा कि समकालीन कविता लोकधर्मी होने के साथ साथ लोकतांत्रिक है और समकालीन कविता हिंदी कविता परंपरा की महत्वपूर्ण परंपरा है इस समय की कविताओं ने समसामयिक विषयों को गम्भीरता से शामिल किया गया है.

स्वागत भाषण संस्था की अध्यक्ष डॉ मीरा सिन्हा ने देते हुए कहा कि मुक्तांचल का नियमित प्रकाशन लेखन की निरंतरता के कारण संभव हो पा रहा है. विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो मनीषा झा ने कहा कि समकालीन कविता वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी है. डॉ. राजीव रावत ने कहा कि समकालीन कविता मानव विरोधी मूल्यों के बरक्स एक संघर्ष की परंपरा है.

दूसरे सत्र में कालीप्रसाद जायसवाल, शैलेंद्र शांत, रणजीत वर्मा,राज्यवर्धन, सेराज खान बातिश, यतीश कुमार, जीवन सिंह, कालिका प्रसाद, रीमा पांडेय, आरती सिंह, चंद्रिका प्रसाद पांडेय, अनुरागी, रामाकांत, आशुतोष सिंह, सरिता खोवाला आदि ने काव्यपाठ किया. इस आयोजन में सुशील पांडेय, विनोद यादव, पार्वती शॉ,  गुड़िया राय, प्रियंका सिंह, विद्या रजक, सुलेखा कुमारी, कुसुम वर्मा आदि का विशेष सहयोग रहा. कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ विजय कुमार साव और मधु सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन विवेक लाल ने दिया.
 

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