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राम जन्मभूमि मालिकाना मामले में एक बार फिर हिंदू और मुस्लिम पक्षकार आमने-सामने

By Republichindi desk | Publish Date: 4/28/2018 4:36:49 PM
राम जन्मभूमि मालिकाना मामले में एक बार फिर हिंदू और मुस्लिम पक्षकार आमने-सामने

नई दिल्लीः अयोध्या राम जन्मभूमि के मालिकाना विवाद मामले में मुस्लिम पक्षकार जमीयत उलमा की ओर से एक बार फिर मामले को संविधान पीठ में भेजे जाने की मांग हुई है, जबकि हिंदू पक्ष और रामलला की ओर से इसका जोरदार विरोध किया गया है. हालांकि कोर्ट ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं सुनाया है. इस मामले पर अगली सुनवाई 15 मई को फिर से होगी.

दोनों पक्षों ने 13 अपीलों के जरिये दी है चुनौती

अयोध्या में राम जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को करीब 13 अपीलों के जरिये हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिस अशोक भूषण व जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की पीठ सुनवाई कर रही है. वैसे तो पिछली दो सुनवाइयों से कोर्ट इस्माइल फारुखी केस में मस्जिद को इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं माने जाने की व्यवस्था पर पुनर्विचार की मांग पर सुनवाई कर रहा था, लेकिन वरिष्ठ वकील राजीव धवन का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण कोर्ट में पेश नहीं हो सके. उनकी जगह जमीयत की ओर से राजू रामचंद्रन पेश हुए, जिन्होंने अयोध्या विवाद का पूरा मामला पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजने की मांग की. 

सुप्रीम कोर्ट का कीमत समय होगा बर्बाद

वहीं रामलला के वकील की दलील थी कि इससे कोर्ट का समय बर्बाद होगा. रामलला की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के. परासरन ने कहा कि यह मामला महत्वपूर्ण है, इसलिए तीन जजों की पीठ सुनवाई कर रही है. इतना काफी है. मामला संविधान पीठ को भेजे जाने से कोर्ट का कीमती समय बर्बाद होगा. संविधान पीठ संवैधानिक मुद्दे सुनने के लिए होती है. वहां पहली अपील में साक्ष्यों को नहीं परखा जाता. संविधान में सिर्फ राष्ट्रपति के चुनाव व प्रेसीडेंशियल रिफरेंस पर सुनवाई पांच जजों की पीठ में होने की बात कही गई है. बाकी सभी मामलों में कोर्ट पहले यह तय करेगा कि मामला संविधान पीठ को भेजने की जरूरत है भी कि नहीं. मान लें कोर्ट कहे कि वह पुरातात्विक साक्ष्यों पर ही विचार करेगा तो मामले का वहीं अंत हो जाएगा.

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