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किसान मुद्दे पर राहुल गांधी को मिला वरुण गांधी का साथ

By Republichindi desk | Publish Date: 1/7/2019 10:07:57 AM
किसान मुद्दे पर राहुल गांधी को मिला वरुण गांधी का साथ
न्यूज़ डेस्क. बीजेपी सांसद वरुण गांधी ने भी उसी मुद्दे को उठाया है, जिसे उठाकर राहुल गांधी 3 बीजेपी शासित राज्यों में वापसी किये हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसानों के मुद्दे पर पीएम मोदी को लगातार घेर रहे हैं. इससे बीजेपी बैकफुट पर है. ऐसे में बीजेपी सांसद वरुण गांधी ने भी अपने भाई राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि साल 1952 से लेकर 2019 तक देश के 100 उद्योगपतियों को जितना पैसा दिया गया, उस रकम का केवल 17 फीसद धन ही केंद्र और राज्य सरकारों से किसानों को आर्थिक सहायता राशि के तौर पर अब तक मिला है. इससे ज्यादा शर्मनाक आंकड़ा कुछ नहीं हो सकता है. 
 
इंडिया डायलॉग कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वरुण गांधी ने देश के किसानों की हालत पर चिंता जताई. वरुण ने कहा कि देश में किसानों को अधिकतर योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है. देश में जब भी किसानों को आर्थिक सहायता देने की बात आती है तो हाहाकार मच जाता है. जबकि देश की 70 फीसद आबादी को बीते 67 सालों में जितनी आर्थिक मदद राज्य और केंद्र सरकारों ने मिलकर दी है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा केवल 100 धनी परिवारों को दे दिया गया.
 
वरुण गांधी ने कहा कि देश के किसानों की ऐसी हालत क्यों है ? इसे समझने के लिए मैं बताता हूं कि देश में होने वाले कुल फल उत्पादन का 56 प्रतिशत शुरुआती 96 घण्टे में अच्छी कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था के अभाव में सड़ जाता है. अकेले यूपी में हर साल 2000 टन उत्पादन होता है और यह बीते 15 साल से हो रहा है. मगर राज्य में कुल कोल्ड स्टोरेज भंडारण क्षमता 70 से 100 टन है जिसका फायदा केवल बड़े किसान ही उठा पाते हैं. क्या आप जानते हैं कि भारत की मंडियों में किसानों के लिए अपने उत्पाद बेचने की खातिर इंतज़ार का औसत समय 1.6 दिन है. जब उसे इतना इंतजार करना पड़ता है तो वो कई बार मजबूरन अपना उत्पाद औने पौने दाम पर बेच देता है.
 
वरुण गांधी ने कहा कि इसके अलावा देश में 1947 से बंटाईदारी अवैध है, लेकिन बिहार में 60 फीसद, झारखंड में 70%, यूपी में 50%, एमपी में 60% किसान बंटाई की ज़मीन पर खेती करते हैं और सीमांत किसान कहलाते हैं. उसे बैंकों से कर्ज नहीं मिलता और स्थानीय महाजन से उसको 40 फीसद की दर से कर्ज लेने की मजबूरी होती है. इसलिए किसानों के नाम पर आंसू मत बहाइए बल्कि रणनीतिक सुधार के लिए काम करिए.

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