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तेजस्वी के अहंकार ने डुबोई महागठबंधन की नैया, असंयमित भाषा का दांव भी पड़ा उल्टा

By Republichindi desk | Publish Date: 5/24/2019 12:33:18 PM
तेजस्वी के अहंकार ने डुबोई महागठबंधन की नैया, असंयमित भाषा का दांव भी पड़ा उल्टा

पटना: मोदी लहर विरोधियों के लिए कहर तो साबित हुई लेकिन बिहार में महागठबंधन को एक तरह से धोबिया पाठ ही मतदाताओं ने दे दिया. बिहार में महागठबंधन को मिली करारी शिकस्त में नरेंद्र मोदी लहर की जितनी भूमिका है, उससे कहीं ज्यादा भूमिका तेजस्वी यादव के अहंकार और अमर्यादित भाषा की रही. पूरे चुनाव प्रचार में अहंकार में डूबे तेजस्वी यादव न सिर्फ बड़बोलापन के शिकार रहे बल्कि अपने अहंकार और बड़बोलेपन में महागठबंधन की नैया भी डुबो डाली. नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सुशील कुमार मोदी जैसे बड़े नेताओं के लिए जिस तरह की भाषा और शैली का उन्होंने इस्तेमाल किया, वह मतदाताओं को कतई रास नहीं आया.

शेर का बच्चा और मां का दूध पीने की बात भी मतदाताओं को नहीं आई पसंद

तेजस्वी यादव के भाषणों में अहंकार, नफरत और बड़बोलापन इस कदर झलकता था कि वह अपने राजनीतिक विरोधियों को गली मोहल्ले की भाषा में संबोधित किया करते थे. कई सभाओं में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह कह कर ललकारा था कि मां का दूध पिया है तो ये करो वो करो. जाहिर है ऐसी भाषा मतदाताओं को किसी सूरत में पसंद नहीं आ रही थी. साइलेंट वोटर्स ने तेजस्वी यादव की इस भाषा को सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के अपमान के तौर पर लिया था. नरेंद्र मोदी की योजनाओं सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक जैसे मुद्दों के साथ-साथ उनके अहंकार और बड़बोलेपन से उपजी नाराजगी ने महागठबंधन को एक सीट पर सिमटा दिया. किशनगंज की सीट ही कांग्रेस को मिल पाई. राजद की तो पूरी की पूरी नैया ही डूब गई.

तेजस्वी को सबक लेने की जरूरत, यह नब्बे के दौर का बिहार नहीं

तेजस्वी यादव को चुनाव परिणामों से भी सबक लेने की जरूरत है. लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद उनको राजद का नेतृत्व थाली में परोसे गए प्रसाद के तौर पर मिल तो गया लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को निभाने में पूरी तरह विफल रहे. क्रिकेट की दुनिया में जिस तरह मैदान से बाहर रहकर तेजस्वी टीम के लिए चीयर अप किया करते थे, राजनीति की पिच पर भी वो इसी भूमिका में आज नजर आ रहे हैं. अपने पहले ही टेस्ट में बुरी तरह विफल तेजस्वी यादव के लिए अब सामने बड़ी चुनौतियां हैं.

तेजस्वी में संभावनाएं अपार लेकिन एमवाई से ही नहीं बनेंगी बात

तेजस्वी यादव विफल राजनेता हैं, किसी सूरत में ऐसा नहीं कहा जा सकता है. उनमें संभावनाएं भी हैं और क्षमता भी है लेकिन राजनीति में बड़बोलापन और अहंकार काम नहीं आता है. तेजस्वी यादव को यह भी ध्यान रखना होगा कि अब पुराना बिहार नहीं है. नब्बे के दशक में उलूल जुलूल बातों, अगड़ा-पिछड़ा, आरक्षण की बात कर कर मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करना आसान था लेकिन अब वैसी बात नहीं है. 1990 के दशक में बिहार को हांकने के अंदाज में लालू सभाओं को संबोधित किया करते थे. तेजस्वी ने भी वही तरीका अपनाया और यही उनके लिए सबसे बड़ी भूल साबित हुई है. तेजस्वी यादव को इन चुनाव परिणामों से सबक लेकर और पूरी समीक्षा के बाद समाज के सभी तबकों को साथ लेने की रणनीति बनाकर ही आगे चलना होगा. नतीजों ने यह भी संकेत और संदेश दे दिया है कि मुस्लिम यादव समीकरण नाम की कोई चीज बिहार में अब नहीं रह गई है और सिर्फ यादव और मुसलमान के सहारे राजनीति की नैया नहीं पार लग सकती है. यादव मतों में वैसे भी एनडीए की सेंधमारी हो चुकी है. यादव बहुल सीटों पर एनडीए उम्मीदवारों की बड़ी जीत यह साबित करती है कि यादव मतदाताओं ने भी बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवारों के पक्ष में वोट किया है.

 

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