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क्या चक्रव्यूह तोड़ पायेंगे अर्जुन, 23 को होगा फैसला

By Republichindi desk | Publish Date: 5/4/2019 5:26:31 PM
क्या चक्रव्यूह तोड़ पायेंगे अर्जुन, 23 को होगा फैसला

रिपब्लिक डेस्क. बैरकपुर में इस बार कांटे की टक्कर है. जूट मिल क्षेत्र के लोगों का मानना है कि दिनेश त्रिवेदी निचले स्तर के लोगों के साथ ज्यादा नहीं घुलते-मिलते लेकिन अर्जुन सिंह इस तबके में काफी लोकप्रिय हैं. वर्ष 2009 और 2014 के चुनाव में दिनेश त्रिवेदी के सारथी की भूमिका में रहे अर्जुन इस बार उनको कड़ी चुनौती दे सकते हैं.कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले की बैरकपुर संसदीय सीट इस बार सुर्खियों में है.

भाटपाड़ा सीट से तृणमूल के टिकट पर लगातार चार बार विधायक रहे अर्जुन सिंह इस बार बीजेपी के टिकट पर त्रिवेदी को चुनौती दे रहे हैं. सूत्रों के अनुसार अर्जुन ने बीते दो चुनावों में त्रिवेदी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी. तृणमूल कांग्रेस की दलील है कि अर्जुन इस बार लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन सीएम ममता ने जब त्रिवेदी को ही तीसरी बार टिकट दी तो अर्जुन ने मुकुल राय का हाथ थाम लिया और बीजेपी में शामिल हो गये. गुरुवार को इलाके में अपनी रैली में ममता ने किसी का नाम लिए बिना कहा था कि इलाके में दो-दो गद्दार हैं. एक बड़ा और एक छोटा. छोटे गद्दार ने लोकसभा का टिकट मांगा था. लेकिन मैं एक व्यक्ति को आखिर कितना कुछ दे सकती हूं. उनकी मांगें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है.

अर्जुन सिंह ने ममता के इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि अगर कोई गद्दार है तो वह खुद ममता बनर्जी ही हैं. क्या दो बार दिनेश के लिए काम करने के बाद इस बार उनके मुकाबले खड़े होने पर कोई दबाव है. इस सवाल पर अर्जुन का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं है. इलाके के लोग मेरे साथ हैं. इस बार लोग तृणमूल को हराने के लिए तैयार हैं. कोलकाता से सटे इस सीट की अहमियत इसी से पता चलती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तक अर्जुन के समर्थन में रैलियां कर चुके हैं.

कभी ममता के बेहद करीबी समझे जाने वाले अर्जुन के साथ तृणमूल की तल्खी लगातार बढ़ने की दो वजहें हैं. पहली तो यह कि वह बीजेपी के टिकट पर दिनेश के ख़िलाफ़ मैदान में हैं. दूसरी अहम वजह यह है कि अर्जुन के इस्तीफे से खाली हुई भाटपाड़ा विधानसभा सीट पर 19 मई को होने वाले उपचुनाव में इस बार अर्जुन के पुत्र पवन सिंह बीजेपी के टिकट पर मैदान में हैं. ममता ने यहां से कभी अपने दाहिने हाथ रहे पूर्व परिवहन मंत्री मदन मित्रा को मैदान में उतारा है. ममता अपनी रैलियों में लोगों से बाप-बेटे की ज़मानत ज़ब्त कराने की अपील की हैं. ममता अपने भाषणों में मौजूदा चुनावी लड़ाई की तुलना साल 1857 के सिपाही विद्रोह से किया है. उस विद्रोह में बैरकपुर की भूमिका काफी अहम थी और ममता ने भरोसा जताया हैं कि लोग उसी तर्ज पर इस बार नरेंद्र मोदी और भाजपा को करारा जवाब देंगे. अर्जुन को इस बार बैरकपुर में कमल खिलने का पक्का भरोसा है.

उनका दावा है कि वर्ष 2009 और 2014 में दिनेश त्रिवेदी की जीत के पीछे उनका ही हाथ था. वे कहते हैं कि इस बार दिनेश की हार तय है. दूसरी ओर, दिनेश त्रिवेदी को जीत की हैट्रिक लगाने का पूरा भरोसा है. वह कहते हैं कि अर्जुन की बाहुबली वाली छवि का फ़ायदा मुझे ही मिलेगा. लोग बाहुबली नहीं चाहते. हिंदीभाषी बहुल्य यह इलाका कभी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले जूट मिल मजदूरों का स्वर्ग था. 70-80 के दशक में सोना उगलने वाली इलाके की जूट मिलों में से अधिकतर या तो बंद हो चुकी हैं या बीमार है.

लेफ्टफ्रंट के शासनकाल में उग्र ट्रेड यूनियन गतिविधियों के चलते इनके बंद होने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह तृणमूल के शासनकाल में भी जस का तस है. बैरकपुर से लेकर नोआपाड़ा, कांकीनाड़ा, भाटपाड़ा और जगद्दल में हुगली के किनारे कतार में खड़ी इन जूट मिलों में से कइयों पर बरसों से ताले लटक रहे हैं, तो कई बीमार चल रही हैं. इन मिलों के अलावा डकबैक समेत तमाम कारखाने लंबे समय से बंद हैं. बीजेपी नेता अर्जुन सिंह इसके लिए तृणमूल कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. हर चुनाव में यह बंद मिलें प्रमुख मुद्दा होती हैं और इस बार भी अपवाद नहीं है.

वर्ष 2009 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी ने 49.28 फीसदी वोट लेकर सीपीएम उम्मीदवार को लगभग 56 हजार वोटों से हराया था. उस साल बीजेपी को यहां महज 3.56 फीसदी वोट मिले थे. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में दिनेश दोबारा जीत तो गये, लेकिन पार्टी को मिलने वाले वोटों में लगभग चार फीसदी की गिरावट आयी थी. सीपीएम को मिलने वाले वोट भी 17 फीसदी घट गये. इससे बीजेपी के वोट तेजी से बढ़ कर 21.92 फीसदी तक पहुंच गया और उसके उम्मीदवार आरके हांडा को 2.30 लाख से ज्यादा वोट मिले. बीजेपी को उम्मीद है कि उनका अर्जुन इस बार यहां तृणमूल कांग्रेस का चक्रव्यूह तोड़ने में सफल होगा. अब सभी निगाहें 23 मई पर टिकी हैं.

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