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हाथी पड़े पांकी में, सियार मारे हुचुकी, लालू ने अपनी हालत पर कही ये कहावत

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 4/16/2019 6:54:53 PM
हाथी पड़े पांकी में, सियार मारे हुचुकी, लालू ने अपनी हालत पर कही ये कहावत

रिपब्लिक डेस्क. राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को जमानत नहीं मिलने पर इस चुनावी महासंग्राम में बिहार की जनता उनके गंवई अंदाज से दिये गये भाषणों से वंचित रहेगी. 44 साल में यह पहला मौका है जब लालू चुनाव से दूर हैं.अपने संकट में होने के दौरान दूसरों द्वारा खिल्ली उड़ाने पर लालू का जवाब होता था कि ‘हाथी पड़े पांकी में, सियार मारे हुचुकी’. उनका विरोधियों पर निशाना साधने से तात्पर्य यह था कि जब हाथी कीचड़ में फंसा रहेगा तो सियार हंसी उड़ायेंगे ही लेकिन हाथी के कद पर उसका कोई अंतर नहीं पड़ता. संकट आयेगा और खत्म हो जायेगा.

चारा घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू को जमानत नहीं दी है. सीबीआई ने कहा था मेडिकल आधार पर जमानत मांगकर वह कोर्ट को गुमराह कर रहे हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने लालू की जमानत याचिका को खारिज कर दिया. लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की कमी उनके परिवार और पार्टी के लोगों को काफी खल रही है.

पिछले दिनों लालू ने रांची के रिम्स अस्पताल से अपनी तकलीफ चिट्ठी के माध्यम से जाहिर की थी. उसके बाद उनकी पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी माना है कि लालू की कमी महसूस हो रही है.राबड़ी ने कहा कि लालू जी होते तो अच्छा होता. चुनाव में उनकी कमी खल रही है. राबड़ी ने कहा कि उनकी बातों को लोगों के बीच रखा जा रहा है.

1970 के दशक में लालू यादव ने अपना सियासी सफर शुरू किया था और सड़क से संसद तक संघर्ष कर बिहार के दलितों-पिछड़ों और वंचितों की आवाज बने थे. 15 साल तक वह बिहार की सत्ता पर काबिज रहे. फिर उन्हें विधानसभा की चुनाव में उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा था. 2014 में हार से हताश विपक्ष को लालू ने जीत का फॉर्मूला दिया और नीतीश के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया और इस गठबंधन के पक्ष में वोटों की बरसात हुई. इसके बाद बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी और लालू ने एक बार फिर सबको बता दिया कि सियासी दांवपेच में उनका कोई जोड़ नहीं है.

इस बार भी चारा घोटाले में सजा काट रहे लालू यादव भले ही जेल में हो, लेकिन वो जेल में रहकर अभी भी बिहार की सियासत में मौजूद हैं. लालू ने जिस तरह से दलों को जोड़कर गठबंधन और सीटों का बंटवारा किया है और तेजस्वी को जिस तरह से सुझाव दे रहे है, इससे साफ है कि लालू अपनी अनुपस्थिति में भी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब हो सकते हैं. 1977 के बाद ऐसा पहला बार होगा जब लालू यादव चुनाव प्रचार से दूर हैं. एक दौर था, जब बिहार में लालू के भाषणों का अंदाज और उनके भाषण देने का नायाब तरीका और उनका जलवा लोगों के सिर चढ़कर बोलता था.

लालू 2014 लोकसभा और 2015 विधानसभा चुनाव के समय जमानत पर बाहर आये थे और धुआंधार प्रचार भी किया था. एक समय ऐसा लग रहा था कि लालू का जादू खत्म हो चुका है, लेकिन उनकी रैलियों में खूब भीड़ उमड़ी और चुनाव के समय मतदाताओं पर उनके पुराने जादू की झलक नजर आयी. बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी और राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. 2015 के बिहार विधानसभा चुनावी सभा में लालू ने मोदी की नकल उतारकर अपने समर्थकों को ख़ूब हंसाया था. अपनी एक रैली में तो उन्होंने ये भी कहा था कि मोदी जी इस अंदाज़ में मत बोलिए, वरना गर्दन की नस खींच जायेगी.

बिहार को पैकेज देने के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा की नकल भी लालू ने बख़ूबी उतार कर दिखाई थी. लालू को दूसरों की नकल उतारने की कला में महारत हासिल है. लालू को जब अपने भाषणों में महंगाई पर वार करना होता तो वो अपने भाषण में कहते थे कि जब चीजें महंगी होती हैं, तो व्यापारी कहते हैं देशावर टनले बा, लेकिन माल ज्यादा होने के बाद चीजें सस्ती हो जायें तो तुरंत जवाब मिलेगा ‘देशावर ठेलले बा’. ‘ताड़ काटो तरकुल काटो, काटो रे बनखजा, हाथी पर के घुघुरा चमक चले राजा’ के माध्यम से वे विराधियों को चेताते रहे कि बच्चों का खेल खेलना बंद करें. राजा हमेशा हाथी पर चलता रहेगा और सबसे ऊंचा रहेगा.
 

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