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हिंसक राजनीति और बंगाल एक दूसरे के पर्याय

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 5/15/2019 12:48:20 PM
हिंसक राजनीति और बंगाल एक दूसरे के पर्याय

रिपब्लिक डेस्क: पश्चिम बंगाल में कल तक जो वाममोर्चा के लिए राजनीतिक हिंसा को अंजाम देते थे आज टीएमसी के सिपहसालार बने हुए. उनमें से ही कुछ लोग अब अंदर ही अंदर बीजेपी के लिए न केवल आवाद बुलंद करने लगे हैं बल्कि हथियार उठाने से भी परहेज नहीं करते. बंगाल में नेताओं की तरह ही कैडर भी हवा देखकर पार्टी बदलने में माहिर हैं. वाममोर्चा के कैडर पहले टीएमसी में और अब बीजेपी की ओर रुख करने लगे हैं. कल तक जो काम वाममोर्चा के लिए करते थे, वही टीएमसी के लिए करने लगे और अब बीजेपी के लिए कर रहे हैं. बंगाल की राजनीति कांग्रेस बनाम वाममोर्चा, वाममोर्चा बनाम टीएमसी और अब टीएमसी बनाम बीजेपी की लड़ाई तक पहुंच गई है.

इतिहास गवाह है कि बंगाल में नेताओं से पहले कैडरों ने पार्टियां बदल ली. 1977 में कांग्रेस के कार्यालयों पर कब्जे हुए. रातों-रात पार्टी के कार्यालय के झंडे बदल दिये गये. यही हाल 2011 में टीएमसी के सत्ता में आने के बाद देखा गया. टीएमसी छोड़कर बीजेपी में जानेवाले मुकुल रॉय, अर्जुन सिंह, माकपा छोड़कर टीएमसी में आनेवाले रज्जाक मोल्ला जैसे नेताओं से पहले कार्यकर्ताओं ने इलाके में क्लबों और पार्टी कार्यालयों का रंग व झंडा (पार्टी) बदल लिया.

वर्तमान समय में देश में चुनावी हिंसा की घटनाएं कम होने लगी हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के संदर्भ में ऐसा नहीं कहा जाता. बंगाल में पुरानी हिंसक राजनीति उसके वर्तमान पर हावी हो जाती है. बस किरदार बदल जाते हैं. पश्चिम बंगाल में पहले सिद्धार्थ शंकर राय के जमाने में हिंसा के आरोप लगे. उसके बाद ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासनकाल में भी हर चुनाव में हिंसा की घटनाएं हुईं. उसके बाद 2011 में ममता बनर्जी ऐतिहासिक परिवर्तन के दावे के साथ आयीं. रातों-रात माकपा के कई कार्यालयों पर टीएमसी के झंडे फहरने लगे. आज बंगाल में ममता बनर्जी का राज है और सामने मुकाबले के लिए बीजेपी ताल ठोंक रही है. आरोप लेकिन वहीं हैं, जो 1977 में लगाये जाते थे, यानी हिंसा की राजनीति आज भी कमोबेश पूर्ववत बरकरार है.

पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति एकतरफा हिंसा की रही है. सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता मारते हैं और विपक्षी मार खाते हैं. जब विपक्ष जवाबी हिंसा करने लगता है तो परिवर्तन के संकेत दिखाई देने लगते हैं. 1960 के दशक में ही सत्ता पर दबदबे के लिए कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट में खूनी जंग तेज हो गई थी. 1977 में कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़कर पश्चिम बंगाल में जब लेफ्ट फ्रंट की सरकार ज्योति बसु के नेतृत्व में बनी तो फिर कांग्रेस धीरे-धीरे सिमटती चली गई.

दूसरी तरफ ज्योति बसु से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य तक लेफ्ट फ्रंट 34 साल तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रही. इन नेताओं के राज में ही 1977 से 2007 के बीच पश्चिम बंगाल में करीब 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं. ममता का भी सियासी संघर्ष कांग्रेस से ही शुरु हुआ लेकिन ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया. बंगाल की सड़कों और गलियों में वाममोर्चा के खिलाफ जी जान से लड़ाई लड़नेवाली ममता बनर्जी ने वाममोर्चा को उन्हीं के अस्त्र से पछाड़ा.

21वीं सदी का पश्चिम बंगाल वाममोर्चा और टीएमसी के संघर्षों से लाल होता रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट राज में 2001 में 21, 2002 में 19, 2003 में 22, 2004 में 15, 2005 में 8, 2006 में 7, 2007 में 20, 2008 में 9 राजनीतिक हत्याएं हुईं, लेकिन ये आंकड़ा अचानक 2009 में बढ़ गई जब राजनीतिक हत्याओ की गिनती पचास तक पहुंच गई. 2010 में ये संख्या थोड़ी घटी लेकिन 38 तक रही. ममता ने वाममोर्चा की हिंसा को मुद्दा बनाया और 2011 में बंगाल से लाल किला को ध्वस्त कर दिया, लेकिन पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाएं कम नहीं हुईं. 2011 में ही 38 राजनीतिक हत्याएं हुईं. 2012 में 22, 2013 में 26, 2014 में 10, 2015 में एक और 2016 में एक राजनीतिक हत्या हुई.

आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाओं में काफी कमी आई है लेकिन बीजेपी का आरोप है कि बंगाल में हिंसा बढ़ी है. पिछले साल बंगाल में पंचायत चुनावों में काफी हिंसा हुई थी. इस बार लोकसभा चुनाव में भी हर चरण में हिंसक घटनाएं हुईं है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी इस राज्य में जोर लगा रही है. हिंसा के आरोप-प्रत्यारोप भी जोरों पर है.
 

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