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महाराष्ट्र में भिड़े दो पवार, भारतीय जनता बनीं गंवार

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 11/25/2019 1:06:38 PM
महाराष्ट्र में भिड़े दो पवार, भारतीय जनता बनीं गंवार

रिपब्लिक हिंदी डेस्क: लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, यह अब कहने-सुनने की बात है. जनता का अधिकार अब केवल वोट देने तक ही सीमित होकर रह गया है. महाराष्ट्र में कुर्सी की लड़ाई इसका जीती-जागता उदाहरण है. महाराष्ट्र में सियासी घमासान के बीच विधायक फाइव स्टार होटलों और एलिट क्लास के गेस्ट हाउसों में विचरण करते रहे. एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के बीच सत्ता और सिंहासन की लड़ाई जारी रही. इस बीच एक महीने पहले अपने मताधिकारों का प्रयोग कर चुकी जनता गंवार साबित हो गयी है. जनता ने तो बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने के लिए क्लीयर मैंडेट दे दिया लेकिन कुर्सी की लड़ाई ने जनता के मतों की अवहेलना की.

शिवसेना को सीएम की कुर्सी चाहिए. कांग्रेस को बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन को तोड़ना है और एनसीपी को सत्ता में भागीदारी चाहिए. इस बीच जनता क्या चाहती है, कोई जानना नहीं चाहता. या यूं कहिये कि चुनाव के बाद नेता और पार्टियां जनता की राय जानना ही नहीं चाहती. इस सियासी गणित के बीच एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस की ओर से 154 विधायकों के शपथ पत्र लेकर सुप्रीम कोर्ट को दिखा आये हैं. सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र मसले पर सुनवाई चल रही है. मंगलवार को फिर सुनवायी होनी तय है. वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि हमारे चुनाव पूर्व साझेदार के साथ नतीजे आने के बाद मतभेद हो गया. फिर एनसीपी ने पखवाड़े बाद हमें समर्थन देकर सरकार बनाने और चलाने पर सहमति बनाई. अब स्थिति ऐसी है कि एक पवार हमारे साथ हैं और दूसरे पवार उनके साथ.

इसी बहस में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कहा कि संवैधानिक स्थितियां कर्नाटक से अलग हैं. यहां संवैधानिक पहलू भी शामिल है. उन्होंने कहा, 145 के जादुई आंकड़े के मुताबिक 170 का समर्थन पत्र है. वो अब निश्चित रूप से कहेंगे कि ये दस्तखत फर्जी हैं. सिंघवी रविवार को ये कोर्ट में ही कह चुके हैं. तुषार मेहता ने कहा कि स्थिति ऐसी हो गयी है कि पूरा अस्तबल ही गायब हो गया है. यहां पर हॉर्स ट्रेडिंग का सवाल नहीं है, बल्कि पूरा ग्रुप ही दूसरी ओर चला गया है. इस पर कांग्रेस के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि सिर्फ घुड़सवार भागा है, घोड़े वहीं पर ही हैं.

कपिल सिब्बल ने कहा कि 22 की रात को प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना ने सरकार बनाने की बात कही. सभी ने कहा कि उद्धव सीएम होंगे लेकिन सुबह 5 बजे ही फडणवीस सीएम बन गए. उन्होंने कहा कि ऐसी कौन-सी इमरजेंसी थी कि सुबह सवा 5 बजे राष्ट्रपति शासन हटाया गया और शपथ दिलवा दी गई. इमरजेंसी का खुलासा होना चाहिए. सियासी नेताओं के स्वार्थ के चक्कर में जनता का फैसला अब कोर्ट की सुनवायी की मोहताज बन कर रह गया है. यह विडंबना ही तो है कि लोकतंत्र में जनता का अधिकार केवल वोट देने तक सीमित होकर रह गया है.
 

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