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सवर्ण आरक्षण से UP में लोकसभा की 40 सीटों पर होगा असर

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 1/8/2019 5:38:05 PM
सवर्ण आरक्षण से UP में लोकसभा की 40 सीटों पर होगा असर

लखनऊ: मिशन 2019 के लिए मोदी का मास्टर स्ट्रोक है सवर्ण आरक्षण. लोकसभा चुनावों में सबसे अधिक सीटों वाले यूपी में सवर्ण आरक्षण चुनावी रणनीति में निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है. यूपी में लोकसभा की आधी से अधिक सीटों पर सवर्ण मतदाताओं का बोलबाला है. राजनीतिक जानकारों के अनुसार यूपी में 40 सीटें ऐसी हैं, जहां सवर्ण मतदाता जीत हार में निर्णायक होते हैं.

यूपी में कुल मतदाताओं का 25-28 फीसदी हिस्सा अगड़ी जातियों का है, जिसमें ब्राह्मण सबसे अधिक हैं. ये आंकड़ा मोटे तौर पर करीब 15 फीसदी माना जाता है. इसके बाद करीब 4 से 5 प्रतिशत क्षत्रिय मतदाता माने जाते हैं. आंकड़ों के अनुसार बीजेपी को हर चुनाव में 50 प्रतिशत से अधिक वोट सवर्ण मतदाता के मिलते आए हैं. 2014 में तो यह आंकड़ा 80 फीसदी तक जा पहुंचा था.

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर व्यापक असर पड़नेवाला है. दिल्ली की सत्ता की चाबी माने जानेवाले इस राज्य का चुनावी गणित जानने के लिए आपको इन क्षेत्रों के बारे में जानना होगा.

इन सीटों पर असर

सीटों पर वोटों के ताने-बाने पर गौर करें तो यूपी के कुशीनगर, गोरखपुर, संतकबीर नगर, देवरिया, भदोई, वाराणसी, अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर, लखीमपुर खीरी, प्रतापगढ़, बहराइच, बाराबंकी, गोंडा, रायबरेली, अमेठी में सवर्ण जातियों का सीधा असर राजनीति पर दिखता है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के गढ़ अमेठी को देखें तो यहां सवर्ण मतदाताओं की संख्या करीब 4 लाख है. इसमें सबसे ज्यादा 1.89 लाख ब्राह्मण, 1.37 क्षत्रिय और करीब 60 हजार कायस्थ, वैश्य और जैन की आबादी है.

सभी राजनीतिक दलों में असमंजस की स्थिति

सभी राजनीतिक दलों में असमंजस की स्थिति है. कोई इसका खुल कर विरोध नहीं कर रहा है. वजह ये है कि सवर्ण आरक्षण के फैसले का सबसे ज्यादा असर यूपी में ही देखने को मिलेगा, क्योंकि 80 में से 40 सीटों पर सवर्ण मतदाता सीधे-सीधे निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. उधर विपक्षी दलों का कहना है कि वह फैसले का स्वागत तो करते हैं, लेकिन इसे सियासत से प्रेरित भी करार दे रहे हैं. दरअसल हाल ही में संपन्न हुए तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों बीजेपी की हार की वजह को सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी से जोड़ा गया.

नोटा का असर

उधर बीजेपी को भी जो फीडबैक मिला, उसमें पता चला कि सवर्ण मतदाताओं ने नोटा को प्राथमिकता दी. उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपनी फीडबैक में सरकार को बताया कि एससी एसटी एक्ट संशोधन के कदम के बाद सवर्णों में नाराजगी है, जिसे दूर करना अति आवश्यक है. ध्यान देने की बात ये है कि बीजेपी के लिए सवर्ण मतदाता काफी अहम रहा है, क्योंकि पार्टी की जीत हो या हार, उसे मिलने वाले मतों में 50 प्रतिशत योगदान सवर्ण मतदाताओं का ही रहा है.

सवर्णों के 40 में से 37 पर बीजेपी जीती थी

यूपी में करीब 40 सीटें ऐसी हैं, जहां सवर्ण वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. खास बात ये है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 71 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेपी को इन 40 में से 37 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी की बम्पर जीत के पीछे सवर्ण मतदाताओं का अहम हाथ रहा. इस चुनाव में 1980 के बाद से सबसे ज्यादा बीजेपी एमएलए सवर्ण वर्ग के जीते. यूपी विधानसभा में इनका प्रतिशत 44.3 है, जो 2012 की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है.
 

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