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क्या 2004 की तरह कांग्रेस को उबार पायेंगी सोनिया गांधी

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 8/13/2019 2:30:46 PM
क्या 2004 की तरह कांग्रेस को उबार पायेंगी सोनिया गांधी

रिपब्लिक हिंदी: यूपीए चेयरपर्सन और कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बिखर चुकी कांग्रेस को 2004 में सत्ता तक पहुंचा दिया था. उस समय भी कांग्रेस बिखर चुकी थी. वर्तमान समय में कांग्रेस कमजोर हो चुकी है. विपक्ष भी बिखर चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सोनिया गांधी कांग्रेस को उबार पायेंगी. क्या वह विपक्ष को एकजुट कर पायेंगी. उनको अंतरिम अध्यक्ष बनाया जाना कांग्रेस को आंतरिक गुटबाजी के संकट से निपटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. सूत्रों के अनुसार कांग्रेस पार्टी के अंदर मतभेद चरम पर पहुंच गए हैं. पार्टी में विभाजन जैसे हालात पैदा हो गये हैं. हर राज्य में पार्टी के नेता सत्ताधारी पार्टी में जाने को आतुर दिख रहे हैं.

कांग्रेस कार्य समिति में वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि पार्टी टूट के कगार पर खड़ी है. इसके बाद सोनिया गांधी ने नयी व्यवस्था होने तक अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल ली हैं. अध्यक्ष का पद संभालने के 48 घंटे के अंदर ही सोनिया गांधी ने बंद कमरों में बैठे पार्टी नेताओं को सड़क पर उतरने और मोदी सरकार से दो-दो हाथ करने की जिम्मेदारी सौंप दी. बावजूद इसके पार्टी के युवा नेता इस बात पर निगाह लगाये बैठे है कि सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद उनके विश्वास पात्र लोग अब किस भूमिका में होगें और राहुल समर्थकों को पार्टी में कितनी तरजीह मिलेगी.

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अपने परिवार के किसी भी सदस्य के अध्यक्ष बनने के खिलाफ थे, लेकिन प्रियंका गांधी का अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सोनिया का समर्थन इशारा करता है कि वह राहुल गांधी के विचार से इत्तेफाक नहीं रखतीं. राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी के एक बाद एक नेता यहां तक कि पार्टी के कुछ राज्यसभा सांसदों का पार्टी छोड़ना सोनिया गांधी को नागवार गुजर रहा था. सोनिया और प्रियंका पार्टी की मौजूदा संकट को भांप गई थी. जानकारों का मानना है कि सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने पर गांधी परिवार और पार्टी में भावनात्मक लगाव बना रहेगा. सोनिया गांधी ने इससे पहले भी लगभग 18 वर्षों तक पार्टी की कमान सफलतापूर्वक संभाल चुकी हैं. सोनिया गांधी की पार्टी के हर वर्ग में पैठ भी है और उनकी बातों को कोई हल्के में लेता. ऐसे में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान अपने हाथ में लेकर पार्टी में गांधी परिवार की मजबूत पकड़ कायम रखी और साथ ही पार्टी को टूट से भी बचा लिया. हालांकि, राहुल गांधी कांग्रेस में बड़े बदलाव की वकालत कर रहे हैं. राहुल पार्टी के अंदर संगठनात्मक, चुनावी और राजनीतिक मोर्चे पर बदलाव चाहते थे.

सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड में सक्रिय होने की हिदायत दी हैं. उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार पार्टी जल्दी ही झारखंड में चुनाव की जिम्मेदारी नये नेतृत्व को सौंपेगी. कार्यसमिति ने सोनिया को नए अध्यक्ष के चुनाव कराने तक अंतरिम अध्यक्ष पद संभालने के लिए मनाया है लेकिन सूत्रों की मानें तो नए अध्यक्ष का चुनाव कई राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के बाद ही होगा. इसलिए सोनिया गांधी के सामने सबसे पहली चुनौती चुनावी राज्यों में संगठन में मचे घमासान को ठीक करना है.

झारखंड के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने पार्टी नेताओं पर भ्रष्टाचार और समझौतों का आरोप लगाकर इस्तीफा दिया है. पूर्व आईपीएस अधिकारी अजय कुमार को नवंबर 2017 में अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था लेकिन वहां पुराने नेता सुबोध कांत सहाय ने उन्हें जमने नहीं दिया. अजय कुमार ने राहुल गांधी को इस्तीफा भेजा था लेकिन उस पर जल्द फैसला सोनिया गांधी को लेना होगा.

दिल्ली और हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव हैं. दिल्ली की अध्यक्ष रहीं शीला दीक्षित के निधन के बाद पार्टी ये जिम्मेदारी जल्द सौंपी जानी हैं. शीला के साथ काम कर रहे तीन कार्यकारी अध्यक्ष भी दावेदार हैं और वे नेता भी जिन्हें शीला विरोधी कैंप का माना जाता है. हरियाणा में अशोक तंवर अध्यक्ष हैं लेकिन उन्हें हटाने का अभियान तीन सालों से चल रहा है और पार्टी में घमासान का कारण वहां जमीन पर संगठन न होना है. तंवर लाख कोशिशों के बाद हरियाणा में पांच सालों में निचले स्तर पर पदाधिकारी नहीं बना सके हैं. सोनिया गांधी को राहुल की टीम के युवा सदस्यों को भी तरजीह देनी है. राहुल के अध्यक्ष ना रहने से उनकी भूमिका और हैसियत में कमी नहीं होगी, इसे भी सुनिश्चित करना होगा. साथ ही अन्य समान विचारधारा वाले दलों के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित करने पर भी जोर देना है.
 

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