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पूर्वांचल के हाथ है सत्ता की चाबी, मोदी, प्रियंका और अखिलेश की प्रतिष्ठा दांव पर

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 4/22/2019 11:41:46 AM
पूर्वांचल के हाथ है सत्ता की चाबी, मोदी, प्रियंका और अखिलेश की प्रतिष्ठा दांव पर

रिपब्लिक डेस्क: उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र को भले ही विकास की दृष्टि से पिछड़ा माना जाता हो लेकिन राजनीतिक रूप से यह परिपक्व और प्रबुद्ध इलाका माना जाता है. इस क्षेत्र में लोकसभा की 26 सीटें आती हैं. पूर्वांचल के लोग किसी के स्वामीभक्त नहीं होते. किसी एक दल से बंधे भी नहीं रहते. इस इलाके में एक पुरानी कहावत है कि यहां कब किसके समर्थन में पूरवा बयार बहने लगे कोई नहीं भांप सकता.

उत्तर प्रदेश के हाथ में सदा से दिल्ली की सत्ता की कुंजी रहती आयी है और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दशा-दिशा पूर्वांचल तय करता है. इस लोकसभा चुनाव 2019 में पूर्वांचल में पीएम नरेंद्र मोदी, यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव, कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी,  यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ,  केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा,  फ़िल्म स्टार रविकिशन, दिनेश लाल निरहुआ, अनुप्रिया पटेल और महेंद्रनाथ पांडेय सहित कई दिग्गजों की किस्मत दांव पर लगी है.

पीएम मोदी पर है दारोमदार

पूर्वांचल में एक पुरानी कहावत है कि यहां कब किसके समर्थन में पुरवइया बह जाए ये कोई नहीं कह सकता. इस बार पूर्वांचल में वाराणसी सीट से बीजेपी प्रत्याशी पीएम नरेंद्र मोदी की साख सबसे ज्यादा दांव पर लगी है. पूर्वांचल में लोकसभा की 26 सीटें है और पिछली बार 26 में से 24 सीटें बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल जीतने में सफल रही. इस बार माहौल और स्थितियां बदल चुकी हैं.

पूर्वांचल की राजधानी मानेजाने वाली वाराणसी सीट पर पीएम नरेंद्र मोदी के सामने अभी कोई नहीं दिख रहा है. कांग्रेस और गठबंधन ने अभी तक अपने प्रत्याशी भी घोषित नही किए हैं. प्रियंका गांधी के नाम की चर्चा चल रही है. मोदी के सामने वाराणसी सीट पर विजय नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल में बीजेपी प्रत्याशियों को जिताने की चुनौती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वाराणसी में मोदी लहर 2014 जैसी नहीं है. सपा-बसपा के गठजोड़ से बीजेपी की कई सीटें खतरे में आ गई हैं. पांच सालों तक दिल्ली में और दो सालों से यूपी में सत्ता में रहने के कारण एंटी इंकंबेंसी फैक्टर भी काम कर रहा है.

प्रियंका गांधी पलट सकेंगी पासा

लोकसभा चुनाव 2019 में पूर्वी उत्तर प्रदेश की बागडोर प्रियंका गांधी को सौंप कर कांग्रेस ने बड़ा दांव खेला है. प्रियंका गांधी को पार्टी ने महासचिव नियुक्त कर मोदी और योगी की लोकप्रियता को चुनौती दी हैं. जिम्मेदारी मिलते ही प्रियंका गांधी ने धुंआधार प्रचार भी शुरू कर दिया है. 2014 में कांग्रेस की सबसे बुरी स्थिति हुई. इस बार सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा कांग्रेस और प्रियंका गांधी की पूर्वांचल क्षेत्र में लगी हुई है क्योंकि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पार्टी का जनाधार और वोट प्रतिशत सबसे कम रहा है. प्रियंका कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे में देखना है कि बीजेपी और गठबंधन से लड़ कर कांग्रेस किस मुकाम पर पहुंचती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि  पूर्वांचल में कुछ सीटों पर कांग्रेस मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है. अधिकतर सीटों पर बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन के बीच ही मुकाबला है.

अखिलेश यादव की डगर भी आसान नहीं

चुनौती सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को भी मिल रही हैं. अखिलेश यादव आजमगढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं और उनके सामने बीजेपी ने भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव ऊर्फ निरहुआ को मैदान में उतारा है. अखिलेश यादव के सामने आजमगढ़ सीट पर विजय पताका फहराने की ही चुनौती नही हैं बल्कि पूर्वांचल की अन्य सीटों पर भी गठबंधन के प्रत्याशियों को जिताने की जिम्मेदारी है. उपचुनाव में सपा ने गोरखपुर सीट से जीत हासिल कर बीजेपी और योगी आदित्यनाथ को पटकनी दी थी और सपा बसपा का गठजोड़ भी सफल रहा था.

सीएम योगी की साख दांव पर

सीएम योगी की भी प्रतिष्ठा दांव पर है. राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो 2 साल के शासनकाल को भी जनता परखेगी. उपचुनाव में गोरखपुर सीट भी बीजेपी को गंवानी पड़ी थी. सपा के प्रवीण निषाद ने गोरखपुर सीट पर विजय हासिल की थी. गोरखपुर का गढ़ बीजेपी का अभेद दुर्ग रहा है और दुर्ग को सपा ने उपचुनाव में ध्वस्त कर दिया था. सीएम योगी की ये सीट कर्मभूमि रही है. इस सीट पर गठबंधन और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला होगा.

मनोज सिन्हा की प्रतिष्ठा दांव पर

गाजीपुर सीट से बीजेपी ने दोबारा मनोज सिन्हा को मैदान में उतारा है तो गठबंधन अफजाल अंसारी और कांग्रेस ने अजीत कुशवाहा को मैदान में उतारा है. राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि चुनाव में राष्ट्रवाद की लहर चली तो बीजेपी को काफी सीटें मिलेंगी लेकिन अगर जातीय समीकरण चले तो गठबंधन कई बड़े चेहरों का खेल बिगाड़ सकते है. हालांकि बीजेपी के कार्यकर्ता इस सीट पर जीत को लेकर आश्वस्त है.

अपना दल के अस्तित्व की लड़ाई

मिर्जापुर सीट पर अपना दल की उम्मीदवार अनुप्रिया पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर है. 2014 में अनुप्रिया पटेल ने बसपा के समुद्र बिंद को हराया था लेकिन इस बार सपा-बसपा गठबंधन और प्रियंका गांधी के कारण इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होगा. कांग्रेस ने एक बार फिर ललितेश त्रिपाठी, सपा से समुद्र बिंद और अपना दल की अनुप्रिया पटेल के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा.

बीजेपी अध्यक्ष भी इसी क्षेत्र से लड़ रहे हैं

इस बार बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्रनाथ पांडेय की मुश्किलें भी बढ़ सकती है.चंदौली लोकसभा सीट से इस बार सपा-बसपा गठबंधन ने उनके लिए खतरे की घंटी बजा दी है. 2014 में डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय ने अनिल कुमार मौर्य को डेढ़ लाख वोटों से हराया था. हालांकि अभी तक गठबंधन ने अपने प्रत्याशी का ऐलान नहीं किया है लेकिन सपा-बसपा के आने से इस सीट पर मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है. डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय ने बीएसपी के अनिल कुमार मौर्य को हराया जबकि सपा प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे. सपा-बसपा के वोटों को जोड़ दें तो महेन्द्रनाथ पांडेय को अपनी सीट बचानी मुश्किल होगी.
 

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