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पीएम किसान: आय बढ़ाते हुए जोखिम कम करना

By Republichindi desk | Publish Date: 3/1/2019 12:39:07 PM
पीएम किसान: आय बढ़ाते हुए जोखिम कम करना

सुरभि जैन और के. वी. सुब्रमण्यन
चूंकि मूल रूप से कृषि एक बहुत ही जोखिम भरी गतिविधि है, जहाँ मौसम में उतार-चढ़ाव और बाजार की कीमतें किसान के लिए गंभीर अनिश्चितता पैदा करती हैं, इसलिए पीएम-किसान योजना किसानों के रिस्कल-रिटर्न ट्रेड-ऑफ को उनके हित में परिवर्तित कर इस स्थिति से निपटने में एक महत्वपूर्ण कदम है. ऐतिहासिक रूप से, भारत में कृषि क्षेत्र में मुख्यह बहस कृषि उत्पादन बढ़ाने और देश को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने पर केंद्रित रहती है. यह अनुमान किया गया कि उत्पादन में वृद्धि से उत्पादकों (किसानों) की आय में वृद्धि होगी. हालाँकि, वास्तव में, जबकि हरित क्रांति के बाद से कृषि उत्पादन चार गुना बढ़ा है, लेकिन किसानों की आय दुगुनी करने पर नीती आयोग नीति पत्र का अनुमान है कि लगभग 1/5th फार्म परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं. इसके अलावा, यह अनुपात राज्य-दर-राज्यो अलग-अलग है.

कम आय के कारण कृषि संकट का संज्ञान लेते हुए, पांच वर्षों की अवधि में यानी 2022-23 तक किसानों की आय दुगुना करने (डीएफआई) के लिए एक समिति का गठन किया गया था. किसानों की  आय बढ़ाने के इस कदम के अनुक्रम में, केंद्रीय बजट 2019-20 में घोषित पीएम-किसान योजना एक महत्वपूर्ण कदम है. इस योजना का उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की सुनिश्चित आय सहायता उपलब्धद कराना है. इस योजना के तहत राशि को सीधे लाभार्थी किसानों के बैंक खातों में, प्रत्येक 2,000 रुपयों की तीन समान किस्तों में, अंतरित किया जाएगा.

हालांकि इस योजना में छोटे और सीमांत किसानों की औसत आय बढ़ाने पर बल दिया गया है, लेकिन इस योजना का सबसे बड़ा प्रभाव इन किसानों द्वारा महसूस की गई अनिश्चितता को कम करने पर ज्याकदा पड़ा है. लघु-सीमांत किसानों, यानी जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है, द्वारा खेती से औसत वार्षिक आय को DFI समिति द्वारा 2015-16 में मौजूदा कीमतों पर रु. 29,132 अनुमानित किया गया है. खाद्य मुद्रास्फीति के समायोजन के साथ, हमने एक छोटे और सीमांत किसान द्वारा खेती से वर्तमान औसत आय का अनुमान रु. 30900 लगाया है. रु. 6000 की आश्वजस्त0 वार्षिक आय सहायता से किसानों की औसत आय में लगभग 20% की बढ़ोत्तरी है. इसमें कोई दो राय नहीं कि यह औसत आय का अनुमान किसानों के बीच अलग-अलग है, जहाँ कई किसानों को इस औसत आय से भी काफी कम प्राप्ता हो रही होगी और वे केवल अपने जीवन निर्वाह के स्तर तक ही सीमित हैं, जबकि अन्य किसान औसत से बहुत अधिक आय प्राप्तव कर रहे होंगे. चूंकि किसानों के लाभ में वृद्धि उन किसानों के संबंध में 20% से अधिक होगी जो औसत आय से काफी कम आय प्राप्त  करते हैं, परंतु रु.6000 की सुनिश्चित वार्षिक सहायता कथित किसानों के लिए बहुत बड़ी राहत की बात है.

इस योजना के तहत सुनिश्चित आय से किसानों को होने वाले जोखिम काफी कम हो जाएंगे. एक किसान पर मौसम की मार और बाजार में अपने उत्पा द के लिए उसे मिलने वाले मूल्यस में अस्थिरता के कारण उसके लिए फसल की पैदावार में अनिश्चितता का खतरा है. प्रोफेसर अश्विनी चत्रे द्वारा इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में किए गए एक हालिया अध्ययन और उनके सह-लेखकों के अध्यनयन से पता चलता है कि कृषि कमोडिटी के मूल्योंक की अस्थिरता, औसत मूल्य की तुलना में 2 से 40 गुना तक है. यह अस्थिरता चावल और गेहूं के संबंध में सबसे कम; टमाटर, गोभी और प्याज के संबंध में मध्यम और फूलगोभी एवं शिमला मिर्च के संबंध में सबसे अधिक है. यहां तक कि अगर हम उत्पादन में अस्थिरता को अनदेखा कर भी लें, तो भी किसान की औसत आय में अस्थिरता, जो कीमतों में उतार-चढ़ाव से उत्पंन्न  होती है, की रेंज उन किसानों, जो चावल और गेहूं की खेती करते हैं, की औसत आय की दुगुनी से लेकर फूलगोभी और शिमला मिर्च उगाने वाले किसानों की औसत आय के 40 गुना के बीच है. इस अनिश्चितता को देखते हुए, हमारा यह अनुमान है कि तीन-चार महीने की अवधि में चावल या गेहूँ उगाने वाले किसान को एक माह में रु. 2000 से कम की आय प्राप्तध होती है. इस प्रकार, तीन-चार महीने की अवधि में से एक माह में, पीएम-किसान द्वारा प्रदान किए गए रु. 2000, इस 4 महीने की अवधि में उसकी आय को दोगुना कर सकते हैं. छोटे या सीमांत किसान, जो किसी अन्य फसल (टमाटर, आलू, प्याज, फूलगोभी या शिमला मिर्च) उगाते हैं, को और भी अधिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है. इसके फलस्वररूप, रु.2000 की सहायता से इन किसानों की अनिश्चितता गेहूं या चावल उगाने वाले किसान की तुलना मे कम हो जाती है.

चूंकि छोटे और सीमांत किसानों का अंश सभी भूजोतों में 86.2% है, इसलिए PM-KISAN कमजोर किसानों के एक बड़े हिस्से को लाभ पहुंचाता है. एक पोजेटिव 'साइड-इफ़ेक्ट' के रूप में, आश्वस्त आय छोटे और सीमांत किसानों के लिए, विशेष रूप से माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं और स्वयं सहायता समूहों से संस्थागत ऋण प्राप्त करना आसान बनाती है. जैसा कि आरबीआई ने हाल ही में छोटे और सीमांत किसानों के लिए कोलेटरल-फ्री कृषि ऋणों की सीमा को रु.1 लाख से बढ़ाकर रु.1.6 लाख किया है, लेकिन पीएम-किसान द्वारा प्रदान की गई सुनिश्चित आय का प्रभाव किसानों के लिए बढती लिक्विडिटी के साथ बढ़ जाएगा.

तुलनात्म.क रूप से कर्ज माफ कर देना किसानों के लिए एक अस्थायी उपाय हो सकता है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों तक कर्ज माफी का लाभ पहुंचना संदेह के दायरे में है क्योंकि छोटे और सीमांत किसान अपने ऋण का50% से अधिक गैर-संस्थागत स्रोतों से लेते हैं, जैसा कि कृषि जनगणना, 2015-16 के डेटा से स्पगष्टर है. ऋण माफी से एक नैतिक जोखिम भी उत्प न्न  होता है क्योंकि जो किसान अपने ऋण का भुगतान करने में सक्षम होते हैं, वे शायद कर्ज माफी की उम्मीद में अपना ऋण नहीं चुकाएंगे. विभिन्न अध्ययनों से यह भी पता चला है कि इस तरह की कर्ज माफी को अक्सर संपन्ना किसानों द्वारा नकारा जाता है जिससे छोटे और सीमांत किसान मुसीबात में आ जाते हैं. कर्ज माफी से क्रेडिट मार्केट की व्यतवस्थाह भी चरमराती है, बैंकों के एनपीए में इजाफा होता है और सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है.

इस प्रकार, यह आय सहायता योजना ‘पीएम-किसान’, जो विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों पर लक्षित है, उन अन्न दाताओं को सहायता देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है जिन्हें  125 करोड़ लोगों के आहार की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

(सुरभि जैन एक निदेशक और के वी सुब्रमण्यन वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं. ये विचार उनके अपने हैं.)
 

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