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मिशन 2019. राष्ट्रवाद के ज्वार में मोदी को बढ़त, विपक्ष बैकफुट पर

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 3/9/2019 3:34:35 PM
मिशन 2019. राष्ट्रवाद के ज्वार में मोदी को बढ़त, विपक्ष बैकफुट पर

रिपब्लिक डेस्क: इतिहास गवाह है कि सत्ताधारी पार्टी को युद्ध जैसै हालात में सदैव राजनीतिक लाभ मिलता रहा है. देश के नागरिकों में देशभक्ति की भावनाएं उफ़ान पर होती हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1971 के बांग्लादेश युद्ध से फ़ायदा पहुंचा था. उन्होंने अप्रैल 1971 से लेकर दिसंबर 1971 तक युद्ध की तैयारी की और अंतत: ये युद्ध जीता भी. एनडीए की अगुवाई में प्रधानमंत्री बनने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को भी कारगिल युद्ध के दौरान पूरे देश का समर्थन मिला. इसके बाद बीजेपी फिर चुनाव जीत गयी. एक सर्वे के अनुसार पुलवामा अटैक के बाद से पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में ईजाफा हुआ है, वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकप्रियता में गिरावट आयी है. पुलवामा हमले के बाद पीएम नरेंद्र मोदी के बढ़ते ग्राफ ने यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को भी फिर से सक्रिय होने को बाध्य कर दिया है.

बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बालाकोट एयर स्ट्राइक को अपनी जीत के दावे के तौर पर पेश कर रहे हैं. हालांकि सच्चाई ये है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तब कम हुआ जब अमरीका और बाक़ी पश्चिमी देशों ने इसमें हस्तक्षेप किया. सत्ताधारी बीजेपी को लगता है कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद मोदी की वापसी के मौक़े पहले के मुक़ाबले बेहतर हो गए हैं. गौरतलब है कि पुलवामा हमले से पहले बीजेपी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में पराजय का मुंह देख चुकी है.

जम्मू कश्मीर के पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले और भारत की ओर से पाकिस्तान के बालाकोट में की गई एयर स्ट्राइक के बाद देश के सियासी हालात पूरी तरह बदल गये हैं. आतंकवाद अब आगामी लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया है और 'बालाकोट एयर स्ट्राइक' के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहतर स्थिति में दिख रहे हैं.

युद्ध जैसे हालात और देश प्रेम के बीच राम मंदिर, बेरोज़गारी, रफ़ाल, कृषि संकट जैसे तमाम मुद्दों को निगल गया है. यही वजह है कि पीएम मोदी लाभ की स्थिति में हैं क्योंकि वो ख़ुद को एक मज़बूत नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जो पाकिस्तान का मुक़ाबला कर सकता है और यही वो मसला है जहां विपक्ष लड़खड़ाता नज़र आता है. भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी अभियान में इसको पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं.

सत्ता विरोधी लहर (एंटी इंनकंबैसी), चुनावी वादा पूरा नहीं कर पाने और अपने ही घटक दलों के विमुख होने से विपक्ष के सवालों को झेल रही बीजेपी की स्थिति पुलवामा और बालाकोट हमले के बाद नाटकीय रूप से बदल चुकी है. पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह आतंकवाद का मुद्दा लेकर विरोधियों पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं.

इससे पहले पार्टी राम मंदिर और विकास को लोकसभा चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाकर पेश कर रही थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 'मंदिर और गाय' पर चर्चा में लगा हुआ था. आरएसएस ने भी 22 फ़रवरी हुई को हुई अपनी आंतरिक बैठक में राम मंदिर जैसे मसलों को पीछे करके आतंकवाद के मुद्दे को आगे ले आया और ऐसे नेता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जो आतंकवाद से लड़ सके. पुलवामा हमले के बाद विपक्ष मोदी को किसी तरह का फ़ायदा नहीं होने देना चाहता था लेकिन बालाकोट हमले के बाद उसे सरकार का समर्थन करने पर मजबूर होना पड़ा. हालांकि विपक्ष का ये समर्थन ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया क्योंकि अब बीजेपी और विपक्ष दोनों ही पुलवामा हमले को लेकर राजनीति कर रहे हैं.

कुछ विपक्षी पार्टियों ने एयर स्ट्राइक पर संदेह जताते हुए सरकार की आलोचना शुरू की तो कुछ ये सवाल पूछ रही हैं कि आत्मघाती हमलावर इतना विस्फोटक लेकर वहां पहुंचा कैसे? इन आरोपों के जवाब में मोदी और बीजेपी ने सवाल पूछने और शक़ जताने वालों को 'राष्ट्रविरोधी' का तमगा देना शुरू कर दिया है. मोदी की सुरक्षा रणनीति से उलझा विपक्ष अब जवाबी रणनीति की योजना बना रहा है. कांग्रेस का दावा है कि उसके पास सरकार पर हमला करने के लिए बहुत से मुद्दे हैं और उनमें से ज़्यादातर मुद्दे ख़ुद बीजेपी ने पैदा किए हैं. इसके अलावा, पिछले तीन-चार दिनों में विपक्ष एयर स्ट्राइक के सबूत की मांग को लेकर एकजुट हुआ है. अब देखना यह है कि क्या विपक्ष एकबार फिर विकास, रोजगार, कालाधन लाने जैसे मुद्दों को फ्रंट पर लाने में कामयाब होगा.
 

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