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मध्यप्रदेश के रास्ते दिल्ली साध सकते हैं राहुल

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 11/12/2018 6:01:04 PM
मध्यप्रदेश के रास्ते दिल्ली साध सकते हैं राहुल

लोकनाथ तिवारी

पांच राज्यों तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनाव परिणामों का असर 2019 के लोकसभा चुनावों पर पड़नेवाला है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तो यह एसिड टेस्ट की तरह है. वर्तमान में भारत के राजनीतिक मानचित्र पर बीजेपी के 64 फीसदी राज्यों में सत्ता पर काबिज है जबकि कांग्रेस मात्र 3 फीसदी भाग पर शासन कर रही है. ऐसे में 11 दिसंबर को यदि कांग्रेस मध्य प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो पाती है तो राहुल गांधी भविष्य में पीएम नरेंद्र को चुनौती देने की स्थिति में होंगे. वैसे राजस्थान और मिजोरम में कांग्रेस की स्थिति बेहतर दिख रही है. मोदी के खिलाफ विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी की छवि निखारने के लिए एमपी की सत्ता बेहद अहम है.

अगर तेलंगाना और मध्य प्रदेश कांग्रेस की झोली में आ गये तो 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल के बीच के मुकाबले की तरह हो सकता है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में राजस्थान को तो पहले ही कांग्रेस की झोली में डाल दिया गया है. लेकिन मोदी संग प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए राहुल गांधी को राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश की जीत सबसे महत्वपूर्ण होगी. सी-वोटर्स के अनुसार तेलंगाना में भी कांग्रेस के जीतने की संभावना व्यक्त की गयी है. इन चुनावों में विजय मिली तो महागठबंधन की राह भी सुगम हो जायेगी. नेतृत्व के रूप में राहुल गांधी के नाम पर बिदकनेवाले अखिलेश यादव, सीताराम येचुरी, शरद पवार, मायावती,  ममता बनर्जी,  एमके स्टालिन के अलावा अन्य गैरएनडीए विपक्षी नेता भी तब अपना सुर बदलने को बाध्. हो जायेंगे. इन नेताओं के साथ-साथ अनुभवी चंद्रबाबू नायडू को साथ लेकर राहुल गांधी बीजेपी के मिशन 2019 को ध्वस्त कर सकते हैं.

इन नेताओं के लिए करो या मरो की स्थिति

मध्यप्रदेश चुनाव कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के लिए करो या मरो की स्थिति जैसी है. प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व देश के किसी अन्य राज्य की तुलना में बेहतर और सशक्त है. इसमें दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अजय सिंह, सुरेश पचौरी, अरुण यादव, सत्यव्रत चतुर्वेदी और कई अन्य नेता हैं जो राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनमें दिग्विजय, कमल नाथ और सुरेश पचौरी उम्र के मामले में ऐसी स्थिति में हैं कि इनके लिए इस बार सत्ता में वापसी नहीं हुआ तो बहुत देर हो जायेगी. यदि कांग्रेस एमपी में बीजेपी को पराजित करने में असफल रही तो कमल नाथ, पचौरी और दिग्विजय सिंह जैसे अनुभवी नेताओं की राजनीति और धूमिल हो जायेगी. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया या जीतू पटवारी जैसे युवा कांग्रेस के भविष्य की उम्मीद हैं.

मध्य प्रदेश के कद्दावर नेताओं का दम

दो बार के सीएम रहे दिग्विजय सिंह को नगरपालिका से संसद तक सभी स्तरों पर चुनाव जीतने के हुनर में माहिर माना जाता है. 1960 से लेकर अभी तक वह कभी चुनाव नहीं हारे हैं. बैकरूम मैनेजर के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री पचौरी उत्कृष्ट हैं जिन्होंने अर्जुन सिंह, अहमद पटेल और अन्य नेताओं के साथ काम करते हुए खुद को मजबूत किया है. फिलहाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल नाथ मध्य प्रदेश में बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए कमर कसे हैं सत्तर के दशक में एक नारा "इंदिरा के दो हाथ, संजय गांधी और कमल नाथ" काफी चर्चित हुआ था. कमल नाथ ने उस समय मोरारजी देसाई को सत्ता से बाहर करने के लिए राज नारायण और चरण सिंह से मुलाकात कर कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. साल 2004 में जब बीजेपी ने प्रहलाद पटेल को उनके खिलाफ खड़ा किया था तो कमल नाथ ने उन्हें छिंदवाड़ा में जीप रैली पर पैसे बर्बाद न करने की सलाह दी थी क्योंकि उनके निर्वाचन क्षेत्र में सभी चार-पहिया वाहनों के मालिक उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे. 13 मई 2004 को जब नतीजे आए तो कमल नाथ ने पटेल को 3 लाख से अधिक वोटों से हराया था. अगर कांग्रेस अंदरूनी गुटबाजी को दरकिनार कर एकजुट होकर चुनाव कर पाती है तो मध्यप्रदेश का साधना मुश्किल नहीं होगा.
 

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