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Article 370:राजनीति में मोदी और शाह की विश्वसनीयता बढ़ी

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 8/5/2019 2:58:06 PM
Article 370:राजनीति में मोदी और शाह की विश्वसनीयता बढ़ी

रिपब्लिक डेस्क: राजनीति में वादे किये जाते हैं, चुनाव जीतने के लिए. चुनाव जीतकर घोषणापत्र में किये गये वादे अब निभाये भी जाने लगे हैं. पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव जीतने के बाद कश्मीर से धारा 370 हटा कर यह साबित कर दिया है कि घोषणापत्र केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक दस्तावेज है, जिसे पूरा करने के लिए ही बनाया जाता है. केंद्र सरकार के इस लौहकदम ने यह साबित कर दिया है कि मोदी ने जो वादा किया था और जिस आर्टिकल 370 की समाप्ति के लिए आवाज उय़ायी थी उसको पूरा करके दिखाया है. इसके साथ ही मोदी देश के इतिहास में एक ऐसी शख्सियत के तौर पर स्थापित हो गए हैं, जो लीक से अलग हटकर बड़े फैसले लेने में चूकते नहीं हैं.

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देश की सियासत के लिए यह एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है. अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी इसके बड़े संकेत जाएंगे. मोदी निर्णायक हैं और बड़े फैसले ले सकते हैं. उनकी यह छवि देश के बाहर भी और देश के अंदर भी और मजबूत होकर उभरी है. पिछले छह दशक से आर्टिकल 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर का निर्माण संघ परिवार और बीजेपी के एजेंडे में रहा है. अब ये एजेंडा पूरा होने की कगार पर हैं. नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जो असंभव को संभव कर ककते हैं. आर्टिकल 370 को हटाने से उनकी विश्वसनीयता बढ़ी है. अब लोगों को उम्मीद बंध गयी है कि राम मंदिर भी निर्माण होगा.

खुद मोदी के लिए कश्मीर का मुद्दा दिल के काफी करीब रहा. कम ही लोगों को आज ध्यान में होगा कि बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष के तौर पर मुरली मनोहर जोशी ने 1991 में कन्याकुमारी से लेकर श्रीनगर के लाल चौक तक जो एकता यात्रा की, उसका प्रारूप खुद मोदी ने तैयार किया था. इस यात्रा में उनके सबसे खास सहयोगी रहे. आतंकी हमले की चुनौतियों के बीच श्रीनगर के लाल चौक पर जाकर मोदी ने झंडा फहराया भी. 2014 लोकसभा चुनावों के पहले जब मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, तब भी पठानकोट में उस जगह मोदी ने जाकर सभा की थी, जहां के नजदीक बने पुल पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गिरफ्तार किया गया था और जहां उनकी याद में एक संग्रहालय भी बना है. मोदी ने उस सभा में मुखर्जी के सपने को पूरा करने की बात की थी. पांच साल पहले मोदी ने जो वादा किया था, और जिस आर्टिकल 370 की समाप्ति के लिए अठारह साल पहले उन्होंने यात्रा की थी, उस वादे को आज पूरा कर दिखाया.

देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल से प्रेरणा पानेवाले अमित शाह ने एक ऐसे प्रदेश का नक्शा बदलने की शुरुआत कर दी, जो आजादी के समय से ही भारत के लिए सबसे बड़े सिरदर्द का कारण रहा है. इसके लिए बीजेपी, संघ परिवार, मोदी और शाह, उन जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं, जो आर्टिकल 370 के साथ जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने को तैयार हो गए थे.

आजादी के समय भारत में साढ़े पांच सौ से भी अधिक देसी रजवाड़ों का विलय कर भारत को मौजूदा भौगोलिक स्वरूप देने वाले सरदार पटेल को तत्कालीन नेताओं के कारण जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देना पड़ा था. सरदार ने अपने समय में इसका विरोध भी किया, लेकिन खुद जवाहरलाल नेहरू ने उस समय आश्वासन दिया था कि आर्टिकल 370 अस्थाई प्रावधान है. विशेष प्रावधान की वजह से ही आजादी के तुरंत बाद कश्मीर मामले में मुश्किलें भी शुरू हुईं और शेख अब्दुल्ला इसे अपनी व्यक्तिगत जागीर समझने लगे. कश्मीर का अलग झंडा रखा गया, अलग संविधान रखा गया, राज्यपाल भी सदर-ए-रियासत कहे गए तो मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा गया. शेख दिल्ली में नेहरू की भाषा बोलते, कश्मीर में अलगाववाद की, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान का एजेंडा आगे बढ़ाते, जिसके तहत कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पर जोर दिया जा रहा था.

आजादी के बाद से ही संघ परिवार ने इस परिस्थिति का विरोध किया. नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर नीति के विरोध में ही मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और एक देश में दो विधान, दो निशान नहीं चलेगा, नहीं चलेगा, इस नारे के साथ आंदोलन शुरू किया. इसी कोशिश में हिरासत में लिए गए मुखर्जी की आखिरकार श्रीनगर में मौत हो गई. मुखर्जी की मौत ही जनसंघ और संघ परिवार के लिए आर्टिकल 370 को खत्म करने के लिए अभियान चलाने के संकल्प को और मजबूत कर गई. यही वजह रही कि जनसंघ से आखिरकार 1980 में बीजेपी की स्थापना हो जाने के बाद भी आर्टिकल 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता और अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण मुद्दे की तरह बीजेपी की राजनीति के केंद्र में रहा.

देशभर में जश्न का माहौल-

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 या फिर आर्टिकल 35ए हटाने और लद्दाख के अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने से केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर लद्दाख के विकास की गति तेज हो सकती है. जम्मू-कश्मीर का फिर से सीमांकन होगा. सियासी तौर पर इससे जम्मू का राजनीतिक रसूख बढ़ जाएगा, क्योंकि आबादी और इलाका दोनों जम्मू का कश्मीर से बड़ा है. जम्मू के लोग मानते भी रहे हैं कि राज्य में शासन चलाने वाले कश्मीर के नेता जम्मू के साथ बेईमानी करते रहे हैं.
 

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