23 जुलाई 2019, मंगलवार | समय 00:19:52 Hrs
Republic Hindi Logo

प्रधानमंत्री पद के सर्वमान्य नेता होकर भी नहीं बन पाये थे ज्योति बसु

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 7/8/2019 12:56:07 PM
प्रधानमंत्री पद के सर्वमान्य नेता होकर भी नहीं बन पाये थे ज्योति बसु

रिपब्लिक डेस्क: रिकॉर्ड समय तक मुख्यमंत्री रहनेवाले ज्योति बसु एक समय प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे थे, लेकिन पार्टी के अनुशासित कैडर के रूप में उन्होंने अपने आप को पीएम के रेस से अलग कर लिया था. वर्ष 2004 में केंद्र में कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार को वामपंथी दलों की ओर से दिए गए समर्थन में भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई. ऐसे समय में जब नेता अपने पद और कुर्सी से चिपके रहते हैं, ज्योति बसु ने सीएम की कुर्सी स्वेच्छया छोड़ दी. उनके जीते जी पश्चिम बंगाल की सत्ता से सीपीएम को कोई हटा नहीं पाया.

1996 में ज्योति बसु भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए संयुक्त मोर्चा के नेताओं के सर्वसम्मति उम्मीदवार बनते दिखाई पड़ रहे थे, लेकिन सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो ने सरकार में शामिल नहीं होने का फैसला किया, जिसे बाद में ज्योति बसु ने एक ऐतिहासिक भूल करार दिया. 21 जून 1977 से 6 नवंबर 2000 तक ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया.

बसु ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद से 2000 में स्वास्थ्यगत कारणों से इस्तीफा दे दिया और साथी सीपीआई (एम) नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य को उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त किया. बसु सबसे लंबे समय तक भारतीय राजनीतिक इतिहास में मुख्यमंत्री के तौर पर सेवा के लिए जाने जाएंगे.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता ज्योति बसु 1977 से 2000 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे. वह भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहे. वह सन् 1964 से 2008 तक सीपीएम पॉलित ब्यूरो के सदस्य रहे.

ज्योति बसु 8 जुलाई 1914 को कलकत्ता के एक उच्च मध्यम वर्ग बंगाली परिवार में ज्योति किरण बसु के रूप में पैदा हुए. उनके पिता निशिकांत बसु, ढाका जिला, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश में) के बार्दी गांव में एक डॉक्टर थे, जबकि उनकी मां हेमलता बसु एक गृहिणी थी. बसु की स्कूली शिक्षा १९२० में धरमतला, कलकत्ता (अब कोलकाता) के लोरेटो स्कूल में शुरू हुई, जहां उनके पिता ने उनका नाम छोटा कर ज्योति बसु कर दिया.

1925 में सेंट जेवियर स्कूल में जाने से पहले बसु ने स्नातक शिक्षा हिंदू कॉलेज (प्रेसीडेंसी कॉलेज) से अंग्रेजी में पूरी की. 1935 में बसु कानून के उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड रवाना हो गए, जहां ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने कदम रखा. यहां नामचीन वामपंथी दार्शनिक और लेखक रजनी पाम दत्त से प्रेरित हुए.

1940 में बसु ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और बैरिस्टर के रूप में मिडिल टेंपल से प्रात्रता हासिल की. इसी साल वे भारत लौट आए. जब सीपीआई ने 1944 में इन्हें रेलवे कर्मचारियों के बीच काम करने के लिए कहा तो बसु ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में संलग्न हुए. बी.एन. रेलवे कर्मचारी संघ और बी.डी रेल रोड कर्मचारी संघ के विलय होने के बाद बसु संघ के महासचिव बने.

बसु 1946 में रेलवे निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ते हुए बंगाल विधान सभा के लिए चुने गए. उन्होंने डॉ बिधान चंद्र रॉय के पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहते हुए लंबे समय के लिए विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया. बसु ने एक विधायक और विपक्ष के नेता के रूप में अपने सराहनीय कार्य से डॉ बी.सी रॉय का ध्यान आकर्षित किया और उन्हें उनका भरपूर स्नेह मिला, भले ही बसु डॉ राय द्वारा चलाई जा रही नीतियों के खिलाफ थे. ज्योति बसु ने राज्य सरकार के खिलाफ एक और एक के बाद एक आंदोलन का नेतृत्व किया और एक नेता के रूप में विशेष रूप से छात्रों और युवकों के बीच गहरी लोकप्रियता अर्जित की. 1964 में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हो गया तो बसु नए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो के पहले नौ सदस्यों में से एक बने.

1967 और 1969 में बसु पश्चिम बंगाल के संयुक्त मोर्चे की सरकारों में उप मुख्यमंत्री बने. 1967 में कांग्रेस सरकार की हार के बाद अजय मुखोपाध्याय के मुख्यमंत्रित्व वाली सरकार में उपमुख्यमंत्री बने. 1972 में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में वापस सत्ता पर लौट आई. ज्योति बसु बारानगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए और चुनाव के दौरान अभूतपूर्व हेराफेरी की शिकायत दर्ज कराई. उनकी पार्टी सीपीआई (एम) ने 1977 में नए सिरे से चुनाव होने तक विधानसभा के बहिष्कार का फैसला किया. ज्योति बसु का 17 जनवरी 2010 को अस्पताल में निधन हो गया.
 

Copyright © 2018 Shailputri Media Private Limited. All Rights Reserved.

Designed by: 4C Plus