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बाजारवाद के दौर में मीडिया के समक्ष चुनौती

By Republichindi desk | Publish Date: 10/15/2019 11:18:02 AM
बाजारवाद के दौर में मीडिया के समक्ष चुनौती

रिपब्लिक हिंदी डेस्क: बाजारवाद के दौर का मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रहा है. या फिर वाकई मीडिया पर बाजारवाद हावी हो चुका है. क्या मायने हैं बाजारवाद के और कैसे इस दौर में रहते हुए मीडिया अपनी स्वतंत्रता केवल राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि बाजार से भी बनाये रखे. इन सवालों के जवाब सैद्धांतिक हैं, उन्हें व्यावहारिक बनाना मौजूदा युग के मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती है.मीडिया एक ऐसा थानेदार है, जिसकी खबर लेने वाला कोई नहीं था. हाल के दिनों में मीडिया ही चोर पकड़ने वाली पुलिस बना. मीडिया ही सजा सुनाने वाली अदालत. निष्पक्ष रहने का पाठ पढ़ाने वाला मीडिया एकतरफा फैसले सुनाने लगा.अब यह सर्वशक्तिशाली होने का अहसास है या फिर बाजार के कुछ ऐसे समीकरण, जहां ऐसा करना मजबूरी बन चुका है.

पर आज भी देश के सुदूर कोनों में बैठे लोग मीडिया से न्याय की आस लगाते हैं. जो पुलिस प्रशासन के सताये, राजनेताओं के ठगे हैं, वे मीडिया की ओर ही ताकते हैं. यह मीडिया का परम दायित्व है कि उन उम्मीदों पर खरा रहे और मीडिया की तमाम आलोचना के बीच भी अगर लोगों की वह उम्मीद जिन्दा है, तो यह बाजारवाद के दौर में मीडिया की बहुत बड़ी उपलब्धि है. आज मीडिया को बाजारवाद के कठघरे में खड़ा किया जाता है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन साथ -साथ यह उतना ही ज़रूरी भी है. चूंकि अगर बदलाव प्रकृति का नियम है, तो सकारात्मक बदलाव वक्त का तकाजा.

अठारहवीं सदी की शुरुआत में अखबार में पहली बार पैसे देकर एक विज्ञापन छपा था. यह एक ऐसे क्रांतिकारी युग का आरम्भ था, जहां धीमे-धीमे छपाई के खर्च की चिन्ता खत्म होने वाली थी. पत्रकार अब केवल अपने उद्देश्य की चिन्ता कर सकते थे, जन-जन तक पहुंचने का जरिया मिल चुका था. आनेवाले दशकों में मीडिया का स्वरूप ज्यों-ज्यों बदला, विज्ञापन भी रंग-रूप बदल-बदल कर ढलते गये. बाजार का विस्तार हुआ. बाजारवाद का जन्म हुआ.

बाजारवाद की दस्तक पहले हमारी भावनाओं पर हुई, या फिर हमारे सिद्धान्तों पर, यह बहस का विषय है, क्योंकि बच्चे को वक्त नहीं दे पाने की सूरत में मां-बाप उसे एक कीमती खिलौना देकर भावनाओं की भरपाई करने लगे. शायरी की जगह स्माइली ने ले ली. गैरज़रूरी चीज़ों से अलमारियां पटने लगीं. समाज बदल गया और बदलते समाज को आईना दिखाता मीडिया भी बदल गया.अगर परिभाषा के हिसाब से चलें, तो यहां जिस न्यूज मीडिया की चर्चा हम कर रहे हैं, वहां खबरों के चयन में बाजार हावी होने के आरोप लगे । यह महज एक अहसास है या हकीकत.

टीआरपी एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है, पर यह है बेहद गूढ़. व्यवसाय की बारीकियों में न जाते हुए आसान शब्दों में समझें तो किसी चैनल को कितने लोग देख रहे हैं, यह टीआरपी से पता चलता है. किसी भी शो की टीआरपी तय करती है कि वह सफल है या नहीं. जैसे कभी एक्शन फिल्मों का दौर आता है और कभी रोमेंटिक फिल्मों का. उसी तरह कभी लोग अजब-गजब न्यूज के शो अधिक देखते हैं, कभी हार्ड पोलिटिकल डिबेट.

इसमें कोई दो राय नहीं कि हर टीवी न्यूज चैनल टीआरपी को महत्त्व देता है, क्योंकि एडवर्टाइजर्स चैनल की साख को इन्हीं अंकों से मापते हैं. लिहाजा अगर रेवेन्यू चाहिए तो टीआरपी बढ़ाना ज़रूरी है और टीआरपी बढ़ानी है तो वह दिखाना होगा, जो लोग देखना चाहते हैं, यानी एक नजरिये से देखिए, तो बाजारवाद का अक्स नज़र आने लगा.

मीडिया के कर्तव्य कहीं निर्धारित नहीं थे, पर अपेक्षा हमेशा ही रही है कि खबरें वे दिखाई जाएं, जिनसे लोगों का सरोकार हो, जिससे लोगों का भला हो. उदाहरण के तौर पर क्या कंगना रनोट और ऋतिक रोशन की चौराहे की लड़ाई से किसी का भला जुड़ा है, क्या मीडिया चैनलों और अखबारों के उन बड़े बॉसेज को यह नहीं मालूम, जो करीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं? क्या लड़ाई से किसी का सरोकार होना चाहिए?

सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है? अगर न इससे किसी का लेना-देना है, न किसी का कोई फायदा है, तो इस खबर को कौन देखता है? सवाल यहां आकर पेचीदा हो जाता है, क्योंकि इस खबर को लोग देखते हैं और बड़ी संख्या में देखते हैं.

लाइव मिन्ट को 2008 में दिए एक इंटरव्यू में स्टार इंडिया के तत्कालीन मुखिया उदय शंकर ने पत्रकारिता के गिरते स्तर पर पूछे एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘‘हमें दो चीज़ों के बीच भेद करने की आवश्यकता है. पहला यह कि क्या ऐसी खबरें जान-बूझकर दिखायी जा रही हैं या फिर काबिलीयत की कमी और अज्ञानता की वजह से किया जा रहा है. मेरा खयाल है भारतीय न्यूज मीडिया में ये दोनों चुनौतियां मौजूद हैं. केवल टीवी नहीं, बल्कि प्रिंट में भी.’’

यह वह दौर था, जब टीवी स्क्रीन पर अजब-गजब खबरों का बोलबाला था. साफ है उस दौर में लोग ऐसी खबरें देख रहे थे, यानी इन खबरों का बाजार था. अब यहां एक बार फिर इस बात को दोहराना ज़रूरी हो जाता है कि बाजार शब्द के उल्लेख भर से कोई भी चीज़ बुरी नहीं हो जाती. मीडिया समाज का आईना है तो बाजार भी प्रतिबिम्ब है.

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों पर टीवी के लिए कोई विस्तृत सीरीज नहीं बनी थी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद के किस्से तो सबने सुने थे, पर बाधा जतिन, प्रफुल्ल चाकी जैसे सेनानियों की कहानी कमोबेश अनसुनी थी. लिहाजा वंदेमातरम नाम के शो के तहत आजतक चैनल पर स्वतंत्रता सेनानियों के किस्से सुनाये गये. शो को आलोचकों से बढ़िया रिस्पांस मिला, पर टीआरपी नहीं मिली. पांच शो के बाद उस सीरीज को बंद करना पड़ा. दूसरी तरफ ‘गांव आज तक’ नाम के शो में अलग-अलग गांव की समस्याएं, उपलब्धियां बतायी गयीं, पर टीआरपी तब-तब मिलती, जब कोई तेंदुआ, भालू गांव में घुस आने की खबर होती या फिर मारपीट की खबरें होतीं.

तो इसका क्या मतलब निकालें, लोगों को शहीदों या सड़क, बिजली की खबरों से कोई सरोकार नहीं, इससे किसी का कोई फायदा नहीं? क्योंकि कोशिश तो की गई कि ‘अच्छी’ खबरें दिखायी जाएं, पर इन ‘अच्छी’ खबरों को देखने वाले कम थे. सीधी-सी बात है, उन खबरों का बाजार नहीं था. इनमें लोगों की रुचि नहीं थी. छात्र होने के नाते आपके मन में सवाल उठेगा कि फिर भी हमें करना तो वही चाहिए, जो तय मानकों के हिसाब से सही हो. इसका जवाब यह है कि जब आपकी बात कोई सुनेगा ही नहीं, तो सन्देश कितना भी सही हो, अपना मकसद पूरा ही नहीं कर सकता. इसीलिए दिखाया वही जाना चाहिए, जिसका बाजार हो, पर सन्देश के साथ छेड़छाड़ बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए.

बाजार खबरों का रुख भले ही तय करे, खबरों का स्वरूप कभी न तय करे. तब बाजारवाद का दौर तो रहेगा, पर बाजारवाद कभी मीडिया पर हावी नहीं हो सकेगा.
अगर आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं तो दो शब्द आपको बेहद परेशान करते होंगे. पहला है पेड मीडिया. दूसरा है प्रेस्टीट्यूट.
ये शब्द हर उस मीडियाकर्मी या संगठन के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जिन पर किसी विचारधारा को प्रायोजित करने का आरोप लगाना हो. यह दूसरी बात है कि आरोप खुद कितने सही या गलत होते हैं, यह सन्देह के घेरे में रहता है.

अपने आरोपों को तोड़े जाने का दर्द एक दफा तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री, जनरल (रिटायर्ड) वी. के. सिंह ने मीडिया पर प्रेस्टीट्यूट का पलटवार करके निकाला था. तब से हिन्दुस्तान में यह शब्द बेहद प्रचलित हो गया, पर यह शब्द उनका आविष्कार नहीं. अमेरिका की पत्रिका ट्रेंड्स जरनल के प्रकाशक जेराल्ड सेलेंट ने प्रेस्टीट्यूट शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले किया था.

अर्बन डिक्शनरी के मुताबिक ‘फ्रीलांस पत्रकार और मुख्यधारा से अलग मीडिया में काम करने वाले पत्रकार, अमूमन प्रेस्टीट्यूट शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए करते हैं, जो सरकार या संस्थाओं के पक्ष में आंख मूंद कर खबरें देते हैं और पत्रकार होने के नाते निष्पक्ष रहने की ज़िम्मेदारी नहीं निभाते.
पर भारत में इस शब्द का दायरा कुछ और बढ़ाकर सरकार के विरुद्ध खबरें चलाने वालों पर भी इसे लागू किया जाता है और धीरे-धीरे यह शब्द हर उस पत्रकार या संगठन के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है, जो किसी के भी विरुद्ध खबरें चलाए. यह कहना गलत नहीं होगा कि आज के दौर में कमोबेश हर पत्रकार किसी न किसी खेमे की नज़र में बाजारू है.

अब पेड मीडिया को भी समझ लें. पेड मीडिया जिस सन्दर्भ में प्रयोग किया जाता है, वह अनुपयुक्त है, क्योंकि इसका शाब्दिक अर्थ है एडवर्टाइजिंग के जरिये प्रचार, पर भारत में इसका इस्तेमाल यह कहने के लिए किया जाता है कि अमुक पत्रकार या संगठन ने पैसे लेकर खबर चलायी. यहां पर यह भी समझ लें कि यह एडवर्टोरियल की बात नहीं, बल्कि पत्रकारिता में भ्रष्टाचार का आरोप है.
यानी कुल मिलाकर यह जनता की मीडिया के उस रूप पर झल्लाहट है, जहां उसे यह प्रतीत होता है कि मीडिया अपने सिद्धान्तों को छोड़कर बाजारू हो गया है, पर बाजारवाद के युग में मीडिया पर विमर्श के दौरान हमें यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार और बाजारवाद एक बात नहीं हैं. इसलिए बाजारी और बाजारू का फर्क खड़ा होता है.

बाजारू वह है, जो बिकाऊ है, जिसका पत्रकारिता के मूल्यों से, सिद्धान्तों से कोई लेना-देना नहीं, जो मीडिया को केवल व्यवसाय समझता है. मसलन चुनाव के वक्त पर पैसे लेकर किसी पार्टी विशेष के पक्ष में खबरें चलाना, या जिस पार्टी की सरकार हो, उसकी कमियों को भी नज़रअन्दाज करना ताकि संरक्षण मिले. बड़े कॉरपोरेट घरानों से एड मिलने के लालच में उनकी त्रुटियों पर पर्दा डालना.

दूसरी ओर बाजारी वह है, जो बाजार की समझ से परिपूर्ण है. जो जनता की नब्ज को समझता है और जनता के लोकप्रिय होकर बाजार का चहेता बनता है. इसके लिए वह प्रायोजित खबरें नहीं दिखाता, पर लोगों के सरोकार की खबरों को इस दिलचस्प अन्दाज में दिखाता है कि लोग उससे नज़रें नहीं फेर सकते.
इन दोनों शब्दों में केवल एक मात्रा का फर्क है, लेकिन जरा-सी हेर-फेर से जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है. यहां सम्पूर्ण मीडिया नहीं, बल्कि अलग-अलग चैनलों और अखबारों के हिसाब से देखना होगा, क्योंकि प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जो बाजारी नहीं हो पाता, वह बाजारू होने का शॉर्टकट अपना लेता है.

यह इस क्षेत्र की बड़ी दुविधा रही है कि क्या किसी पार्टी की विचारधारा से जुड़े होने का भ्रम किसी चैनल या अखबार को बाजारू बनाता है ? क्योंकि हिन्दुस्तान में भले ही पोलिटिकल लीनिंग, यानी चैनल/अखबार के राजनीतिक झुकाव को लेकर तस्वीर स्पष्ट नहीं होती, पर अमेरिका में इस बाबत एक दिलचस्प सर्वे किया गया. PEW रिसर्च सेंटर की स्टडी ने यह जानने की कोशिश की, कि अलग-अलग राजनीतिक राय रखने वाले लोग, किस टीवी/मीडिया को देखते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक अधिकतर कंजर्वेटिव विचारधारा वाले फॉक्स न्यूज देखते हैं और लिबरल्स मिले-जुले मीडिया पर निर्भर हैं. इनमें अव्वल है न्यूयॉर्क टाइम्स, तो क्या इसे इन मीडिया का पक्षपात समझें या फिर देखने वालों का भ्रम.

केवल भारत में ही मीडिया को लेकर एक नयी छटपटाहट नहीं देखी जा रही, बल्कि बाजारवाद से हमसे पहले दो-चार हो चुके अमेरिका में यह चर्चा दशकों से जारी है. ‘व्हाय अमेरिकन्स हेट द मीडिया एंड हाउ इट मैटर्स’ में जॉनाथन एम. लाड लिखते हैं, ‘‘एक निष्पक्ष, ताकतवर और व्यापक तौर पर सम्मानित न्यूज मीडिया अब इतिहास की बात है. 1950 से 1979 के बीच एक ऐसा दौर ज़रूर था, जब संस्थागत पत्रकार गणराज्य के शक्तिशाली रक्षक थे, जो राजनीतिक संवाद में सर्वोच्च स्तर बनाये रखते थे.’’

हालांकि लाड आगे लिखते हैं, ‘‘अधिकांश मामलों में किसी एक मीडिया को दुष्प्रचार की वजह से पक्षपात का दाग झेलना पड़ता है. हकीकत इससे अलग होती है.’’
किसी मीडिया हाउस के बाजारू न होने का दायित्व उसके हर एक पत्रकार पर भी होता है. जिन मूल्यों और सिद्धान्तों के लिए पत्रकारिता जानी जाती है, उसे लागू रखना व्यक्तिगत तौर पर हर पत्रकार की ज़िम्मेदारी होती है. यह भी याद रखना ज़रूरी है कि कोई भी चैनल या न्यूज मीडिया जब अपने स्तर को इतना गिराता है कि समाज में अधिकतर लोग उसे बाजारू मानने लगते हैं, तो उसका बाजार खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है.

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