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बीजेपी शासित तीनों राज्यों में बीजेपी के लिए स्थितियां आसान नहीं

By Republichindi desk | Publish Date: 11/8/2018 4:57:04 PM
बीजेपी शासित तीनों राज्यों में बीजेपी के लिए स्थितियां आसान नहीं

लोकसभा चुनाव 2019 यदि फाइनल और पांच राज्यों का चुनाव सेमीफाइनल है तो कर्नाटक के 5 सीटों का उपचुनाव क्वार्टर फाइनल था. क्वार्टर फाइनल (उपचुनावों) के नतीजों का असर सेमीफाइनल यानी 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी दिखाई पड़ेगा. कांग्रेस जहां इन नतीजों को अपना माहौल बनाने में इस्तेमाल करेगी, वहीं बीजेपी की कोशिश इन राज्यों में अपने काडर व समर्थक वर्ग को एकजुट करने की होगी. कर्नाटक में बीजेपी को अपनी एक लोकसभा सीट बेल्लारी गंवानी पड़ी है. हालांकि वह शिमोगा सीट को बरकरार रखने में सफल रही है. जबकि विधानसभा उपचुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली है. नतीजों के बाद बीजेपी के राज्य के प्रमुख नेता बीएस येदियुरप्पा का यह बयान काफी महत्वपूर्ण है कि नतीजे बीजेपी के लिए चेतावनी है.

5 राज्यों की विधानसभाओं के लिए होने जा रहे चुनाव की तस्वीर के रंग भी धीरे धीरे स्पष्ट हो रहे हैं. इनमें से 3 राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं और वहां व्यवस्था विरोधी वोट के अलावा पार्टी को अंदरूनी चुनौतियों का मुक़ाबला करना पड़ रहा है. आंतरिक अनुशासन तार-तार है. आलाकमान को प्रादेशिक क्षत्रपों के सहारे क़ामयाबी मिलने का भरोसा नहीं है. इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने चुनावी शतरंज की कई चालें आस्तीन में छिपा रखी हैं. अभी तक इन राज्यों का चुनावी रूप लेकिन बीजेपी के लिए बहुत हौसला बढ़ाने वाला नहीं है.

मध्यप्रदेश : 15 साल में पहली बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इतने असहाय दिखाई दे रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने उनका चेहरा पार्टी से ऊपर माना था. वे कहते थे, शिवराज आदमी अच्छा है, कांग्रेस में उसके सामने कोई नहीं है. इसलिए इकतरफा मुकाबला रहा. इस बार शिवराज के सामने हजार मुश्किलें हैं. पांच साल का कामकाज सबसे बड़ा संकट है. व्यापम घोटाले ने छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है. कोई भी फैसला इसकी भरपाई नहीं कर सकता. पंद्रह सालों में भ्रष्टाचार के सीधे-सीधे आरोप लगे हैं. लोग मुख्यमंत्री आवास पर उंगलियां उठाते रहे. तीसरे कार्यकाल में तो नौकरशाही ने ही मुख्यमंत्री के पर कतर दिए. शिवराज हर बैठक में अफसरों को चेतावनी देते रहे. अफसर उस पर ठहाका लगाते रहे. जाहिर है शिवराज तीसरी बार इस अड़ियल घोड़े की सवारी नहीं कर पाए. राजनीतिक स्तर पर मुख्यमंत्री की चुनौतियां विकराल हैं. जबसे आडवाणी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य बताया था, तबसे ही वे आला नेताओं के निशाने पर आ गए थे. बीते 5 बरस एक बीजेपी में दो पार्टियां चलती रहीं. एक केंद्रीय नेताओं की तो दूसरी मुख्यमंत्री की. इसे शिवराज वक़्त रहते समझ नहीं पाए. कुछ तो उनके व्यवहार से और कुछ केंद्रीय नेताओं के प्रयासों से शिवराज समर्थक छिटकते रहे. आज वे एकदम अकेले खड़े नजर आते हैं. आलोचक अनेक हैं- उमा भारती, प्रभात झा, बाबूलाल गौर, यशोधरा राजे सिंधिया, नरोत्तम मिश्रा, नरेंद्र सिंह तोमर, गौरीशंकर शेजवार, लक्ष्मीकांत शर्मा, कैलाश विजयवर्गीय और राकेश सिंह जैसे अनेक प्रादेशिक नेता शिवराज सिंह चौहान से किनारा कर चुके हैं. जातिगत समीकरणों के चलते भी शिवराज सिंह कमजोर पड़े हैं. सिंधिया घराने पर उनके निजी हमले कम तीखे नहीं रहे. यशोधरा राजे सिंधिया ने अनेक अवसरों पर अपना दर्द बयान किया. जो पार्टी उनकी मां के अनुदान पर जन्मी थी, उसी ख़ानदान पर सवाल खड़े करने के कारण शिवराज ने बेवजह पार्टी के भीतर विरोध मोल ले लिया. क्षत्रिय क्षत्रप भी इस कारण उनसे दूर जा बैठे हैं. इस बार अपने व्यवहार के चलते शिवराज अपने अनेक समर्थकों को टिकट भी नहीं दिला पाए. आज आलम यह है कि उन्हें मध्यप्रदेश के व्यवस्था विरोधी वोट का मुकाबला करना पड़ रहा है और केंद्र के साढ़े चार साल के कार्यकाल में नकारात्मक वोटों की जो फसल उगी है, उसे भी मुख्यमंत्री को काटना पड़ेगा. संगठन के लिए यह एक गंभीर चुनौती है.

राजस्थान : वसुंधरा राजे सिंधिया अफसरशाही पर तो सख्ती से पेश आती रहीं लेकिन संगठन पर अच्छी पकड़ के बावजूद पार्टी के भीतर उठे असंतोष के स्वरों को वे शांत नहीं कर पाईं. लोकतांत्रिक ढंग से उन्हें साथ लेकर चलने में वसुंधरा राजे का अपना मिजाज आड़े आता रहा. केंद्रीय नेतृत्व से भी उनकी नोकझोंक चलती रही. कभी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव पर तो कभी प्रदेश के अन्य मसलों पर. राज्य सरकार के कार्यक्रमों की उपलब्धियों का श्रेय वो खुद लेती रहीं, केंद्रीय योजनाओं के लिए आलाकमान का उपकार मानने में उन्होंने हमेशा कंजूसी दिखाई. शिवराज सिंह चौहान की तरह उन्हें भी यह तथ्य देर से समझ में आया कि उनके समर्थकों की झोली अब रीत रही है. समर्थन में रहे राजनेता केंद्रीय पाले की ओर धीरे धीरे खिसक रहे हैं. उम्मीदवारों के चुनाव में उनके समर्थक प्रत्याशियों की हालत पतली है. वे अपने करीब करीब सवा सौ पुराने विधायकों को टिकट दिलाना चाहती थीं. केंद्रीय नेतृत्व नकारात्मक वोटों का हवाला देकर नए चेहरे मैदान में उतारना चाहा. इससे भी वसुंधरा राजे का संकट बढ़ता दिखाई दे रहा है. क्योंकि पिछले चुनाव में तो एक तरह से उन्होंने ही टिकट बांटे थे. इस बार जातिगत समीकरण भी चौंका रहे हैं. ब्राह्मण वोट इस बार वसुंधरा के पक्ष में नहीं दिखाई देता. जहां तक राजपूतों का सवाल है तो वे बंटे हुए हैं. राजपूतों के कई स्थानीय चेहरे और संगठन इस चुनाव में वसुंधरा से कन्नी काट चुके हैं. पार्टी के करीब 30 विधायक राजपूत हैं. अगर वसुंधरा उन्हें टिकट नहीं दिला सकीं तो वे बागी हो सकते हैं. इस दृष्टि से बीजेपी के लिए आने वाले कुछ दिन बहुत मुश्किल भरे हैं. राजस्थान में वैसे भी 1998 के बाद से हर पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा है. इस नाते इस बार कांग्रेस की आशाएं बन रही हैं. ऐसे में वसुंधरा राजे सिंधिया के लिए इस बार बाजी बहुत आसान नहीं है.

छत्तीसगढ़ : अपेक्षाकृत चुनौतियों का आकार थोड़ा छोटा है. जितनी साफ़ तस्वीर मध्यप्रदेश और राजस्थान में नज़र आती है, उतनी छत्तीसगढ़ में नहीं. मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने समय रहते आलाकमान के साथ कदमताल शुरू कर दी इस कारण वे केंद्रीय नेतृत्व के उस तरह निशाने पर नहीं रहे, जितने शिवराज और वसुंधरा. पार्टी के अंदर रमन सिंह के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं है. उनकी असल चुनौती दक्षिण छत्तीसगढ़ में नक्सली समस्या से निपटने में सरकार की विफलता है. बस्तर में हाल ही में एक वीडियो पत्रकार की हत्या हुई. पिछले चुनाव में कांग्रेस के अनेक नेताओं की मौत चुनाव अभियान  के दौरान हुई थी. अब उन इलाकों से उन कांग्रेसी नेताओं के परिवार से निकला युवा नेतृत्व सामने है. इस जवान खून को लोगों का व्यापक समर्थन और सहानुभूति मिल रही है. रमन सिंह के लिए एक दांव उलटा पड़ गया है. कांग्रेस के वोट काटने के लिए उन्होंने पार्टी छोड़ चुके कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी से भीतरखाने तालमेल किया था. इसके बाद जोगी ने बसपा से चुनावी समझौता कर लिया है. मायावती ने जोगी की पुत्रवधु को टिकट देकर इस समझौते पर मुहर लगा दी है. अगर बसपा और जोगी कांग्रेस में अच्छा तालमेल रहा तो उसका नुकसान बीजेपी और रमन सिंह को होगा. बिलासपुर और सरगुजा इलाक़े में यह गठबंधन असर दिखा सकता है. पिछले चुनाव में वैसे तो बीजेपी और कांग्रेस के वोट प्रतिशत में 0.7 फीसदी का बारीक अंतर था. देश भर में सबसे ज़्यादा तीन फीसदी नोटा वोट भी छत्तीसगढ़ में ही पड़े थे. कोई 1.8 फीसदी वोट बसपा के थे. इस कारण रमन सिंह की सबसे गंभीर चुनौती यही है. कुल 46 सीटें जीतने के लिए उन्हें वोट भी 50 फ़ीसदी लाने होंगे, जो किसी भी सूरत में संभव नहीं दिखाई देता.

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