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बंगाल दुर्गापूजाः सवाल अगर आस्था का है तो आयकर विभाग के दखल से परहेज क्यों?

By Republichindi desk | Publish Date: 8/27/2019 4:22:49 PM
बंगाल दुर्गापूजाः सवाल अगर आस्था का है तो आयकर विभाग के दखल से परहेज क्यों?

सम्पदा झाः पश्चिम बंगाल की दुर्गापूजा जगजाहिर है. हर वर्ष देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी लोग दुर्गापूजा में बंगाल आते हैं. बंगाल में खासकर कोलकाता सहित निकटवर्ती क्षेत्रों में दुर्गापूजा के दृश्य देखते ही बनते हैं. दुर्गा पूजा में कोलकाता सहित आसपास के क्षेत्रों की हर गली में लगभग मां दुर्गा की भव्य मूर्ति सहित बेहतरीन पंडाल बने होते हैं. पूजा से कई महिने पहले ही मूर्तिकार मूर्तियों को भव्य रुप देनें में जुट जाते हैं. साथ ही हर मूर्ति में मेहनत के अनुकूल शुल्क भी पहले ही निर्धारित कर दी जाती है. दुर्गा पूजा को लेकर बंगालवासियों में एक अलग ही उत्साह होता है. विश्वप्रसिद्ध पूजा देखने श्रद्धालु ही नहीं टूरिस्ट भी विदेश से बंगाल पूजा का आनंद लेते पहुंचते हैं. ऐसे में बंगाल के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होती है पंडालों को बेहतर सजाना व मूर्तियों को और भी भव्य रूप देना. इतना ही नहीं बंगाल में हर पूजा कमेटियों के बीच प्रतियोगिता भी होती है. जो कि और चुनौती भरा होता है.

हालांकि करोड़ों खर्च करने वाले पूजा कमेटी क्षेत्र के लोगों से चंदा भी वसूलते हैं. इतना ही नहीं जो पूजा कमेटियां राज्य सरकार के संपर्क में है, उसे राज्य सरकार द्वारा कुछ खर्च भी दिया जाता है. हालांकि साल 2018 में बंगाल सरकार ने कई पूजा कमेटियों को 10-10 हजार रुपया मुहैया की थी. जिसके बाद केन्द्र की नजर बंगाल की दुर्गा पूजा पर पड़ी और सवाल उठने शुरु हो गये.

केन्द्र ने बंगाल सरकार से दुर्गा पूजा में करोड़ों हो रहे खर्च का हिसाब-किताब मांगा. इतना ही नहीं बड़ी-बड़ी पूजा कमेटियों आयकर की नोटिस भी दी गई. जिसके बाद बंगाल सरकार भड़क गई और बंगाल की सीएम ने केन्द्र को साफ तौर पर कहा कि बंगाल की दुर्गापूजा पर नजर न लगायें. सीएम ने कहा कि पूजा हमारी आस्था है इस पर हम किसी की दखल बर्दास्त नहीं करेंगे.

ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि अगर ये आस्था है तो क्या मां दुर्गा करोड़ों रुपये देती हैं पूजा में खर्च करने के लिए या फिर नेताओं के माध्यम से पूजा कमेटियों को दान स्वरुप दिये पैसे काले धन को सफेद करने के लिए होता है.

आज भी देश में कई लोग भूख से मरते हैं. कितनों के पास पढ़ने के लिए पैसा नहीं है. रहने के लिए घर नहीं है. वैसे में आस्था के नाम पर करोड़ों रुपये को खर्च करना क्या उचित है? जो पैसा लोगों को जीवन दे सकता है, संवार सकता है, उसे यूं पानी की तरह बहाना क्या उचित है?

हालांकि इन सभी खर्चों का ब्यौरा राज्य सरकार के पास होता है. फिर भी वो चुप रहती हैं. राज्य सरकार के जानकारी में ही बंगाल की पूजा में इतने पैसों की खर्च होती है. अब सवाल ये उठता है कि अगर ये आस्था का सवाल है तो फिर पूछताछ में मनाही क्यों? पूजा का खर्च को लेकर आखिरकार बंगाल सरकार को चिढ़ क्यों है? हालांकि पूजा में तो लोगों से जबरन चंदा भी वसूला जाता है. अगर पूजा में करोड़ों का खर्च चंदा में लिये गये पैसों से भी होता है. तो सरकार को आयकर के सवाल से या फिर पूछताछ से परहेज क्यों है?

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