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INSIDE STORY: किगमेकर लालू के चुनावी प्रबंधन का नायाब तरीका

By Republichindi desk | Publish Date: 4/1/2019 10:11:46 AM
INSIDE STORY: किगमेकर लालू के चुनावी प्रबंधन का नायाब तरीका

 पटना: राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव अपने करिश्माई नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं. किंगेमकर की भूमिका में सालों दशकों तक रहे लालू प्रसाद सशक्त वोट बैंक के लिए तो जाने जाते रहे ही हैं साथ ही गांवों के कार्यकर्ताओं तक भी उनका सीधा संवाद रहा है. चुनावों के दौरान बूथ तक के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करने की उनकी शैली छोटे कार्यकर्ताओं को भी उनसे सीधे जोड़ लेती है. पटना के वरीय राजनीतिक पत्रकार शशिभूषण ने 2015 विधानसभा चुनावों के दौरान लालू के इस चुनावी प्रबंधन कौशल को बारीकी से देखा था और अपने उस अनुभव को उन्होने साझा भी किया है.

पढिए, कैसे कार्यकर्ताओं से कनेक्ट करते हैं लालू

10 अक्टूबर 2015 की तारीख.. दिन शनिवार, डायरी में कलमबद्ध अपने संस्मरण के पन्ने पलटते हुए इस तारीख पर आकर ठहर गया। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग दो दिन बाद होनी थी। बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने बिहार का रण जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी। पटना एयरपोर्ट से उड़ान भरकर बिहार का चक्कर लगाने वाले नेताओं की भरमार थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बिहार में जनसभा करने का सिलसिला जारी था और साथ ही साथ दर्जन भर से ज्यादा एनडीए के नेता हर दिन हैलीकॉप्टर से चुनाव प्रचार कर रहे थे। लेकिन इसके उलट महागठबंधन के चुनाव प्रचार की कमान आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संभाल रखी थी। पहले चरण को जिन सीटों पर वोटिंग होनी थी वहां चुनाव प्रचार शाम के वक़्त थम गया था। लालू प्रसाद भी अपने दिनभर के थका देने वाले चुनावी दौरे के बाद पटना आवास पर पहुंच गए थे। हरे रंग के चेक वाले कुर्ते में प्रचार करके वापस आये लालू प्रसाद 10 सर्कुलर पहुंचने के आधे घंटे बाद ही पोलो टी-शर्ट में बैठे थे। सामने चुनावी प्रचार का कार्यक्रम लेने वाले उम्मीदवारों की भीड़ थी तो साथ में उनके अन्य दरबारी भी मौजूद थे। लालू प्रसाद के पीछे खड़े उनके सहयोगी भोला यादव और स्टाफ उपेंद्र सुप्रीमो के निर्देश पर हर मिनट मोबाइल पर किसी नए शख्स से बात करवा रहे थे। बिना कैमरे के जिन चंद पत्रकारों राबड़ी आवास में अंदर जाने की इजाजत मिली उसमें मैं भी शामिल था। पत्रकारों को देखते ही लालू प्रसाद ने टोका.. का हो आपलोग यहीं हैं, फील्ड में नहीं जाते हैं? किसी पत्रकार साथी ने जवाब दिया - वोटिंग में जाएँगे। फिर सभी लालू प्रसाद के इर्दगिर्द बैठ गए। शनिवार का दिन था सो लालू प्रसाद ने भूंजा मंगवाया और शुरू कर दिया ऑपरेशन। 12 अक्टूबर को जिन सीटों पर वोट पड़ने थे उस विधानसभा क्षेत्र में अपने खास लोगों को लालू एक एक करके फोन लगवाकर बात करते रहे। मुझे अच्छे से याद है कि पहले चरण वाली सीटों में समस्तीपुर के मोहिद्दीन नगर विधानसभा सीट पर वोट पड़ने थे। लालू को फीडबैक मिला था कि उनका एक पुराना समर्थक ने इस सीट पर पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के उम्मीदवार अजय बुल्गानिन को सपोर्ट कर रहा है उन्होंने तुरंत उस पुराने कैडर को फोन लगवाया और बुल्गानिन की बजाय आरजेडी की उम्मीदवार ऐज्या यादव को सपोर्ट करने को कहा। लालू ने बातचीत में यहां तक कह डाला कि अगर ऐज्या चुनाव नहीं जीतीं तो वह मोहिद्दीन नगर में कभी कदम नहीं रखेंगें। इसी दरम्यान कटोरिया विधानसभा सीट को लेकर यह बात जैसे ही लालू के सामने आई कि वहां आरजेडी उम्मीदवार स्वीटी सीमा हेम्ब्रम को पिछड़े वर्ग का वोट मिलने में मुश्किलें आ सकती हैं। लालू प्रसाद ने तकरीबन आधा दर्जन स्थानीय कैडरों को कॉल लगवाकर मुस्तैद रहने को कहा, साफ फरमान सुना दिया कि स्वीटी हेम्ब्रम एक आदिवासी महिला है और उसे ही सदन में चुनकर आना चाहिए। यह दो वाकया महज एक उदाहरण भर है लालू प्रसाद के इलेक्शन मैनेजमेंट का। चुनाव प्रचार थमने के बाद और वोटिंग के पहले कैसे चुनावी प्रबंधन किया जाता है यह लालू प्रसाद से बेहतर कोई नहीं जानता।

साल 1990 से लेकर 2015 के विधानसभा चुनाव तक बिहार में लालू प्रसाद के बग़ैर चुनाव का मतलब बेमानी है। लालू प्रसाद चुनावी बिसात के सबसे माहिर खिलाड़ी हैं। वह चाल चलना भी जानते हैं और सामने वाले को घेरकर रखना भी। हर बार उनकी कोशिश केवल यही रही है कि सामने वाले को मात दी जाए। लेकिन 28 साल बाद ऐसा शायद पहली बार हो कि चुनाव के दौरान लालू प्रसाद इस रण से बाहर हों। चारा घोटाला में सज़ायाफ्ता होने के बाद बीमार चल रहे लालू प्रसाद की आखिरी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है। अगर सुप्रीम कोर्ट लालू को जमानत पर रिहा करती है तभी वह चुनाव के दौरान जेल से बाहर आ पाएंगे। संभव है कि लालू प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट सशर्त जमानत दे भी दे लेकिन उस परिस्थिति में इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती लालू चुनाव प्रचार करते नज़र आयेंगे। लेकिन इस सबके बावजूद लालू प्रसाद का जेल से बाहर आना आरजेडी और महागठबंधन के लिए फायदेमंद होगा। लालू अगर अपने पटना आवास पर भी चुनावों के दौरान मौजूद रहे तो वह अपने इलेक्शन मैनेजमेंट का जादू दिखा सकते हैं। लालू बेहतर जानते हैं किस सीट पर कौन सा उम्मीदवार किस कमजोर कड़ी को पकड़े बैठा है। लालू प्रसाद को कैडर एक्टिवेशन में महारथ हासिल है। वह अपने ही पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन दिलवाने के लिए उसे कैडर के सामने कोस भी सकते हैं और खरी खोटी भी सुना सकते हैं। उन्हें केवल उम्मीदवार की जीत से मतलब है।

केवल 2015 के विधानसभा चुनाव पर नज़र डालें तो लालू प्रसाद ने चुनावी कैम्पेन में सबको पीछे छोड़ दिया था। 33 दिनों के चुनाव अभियान में लालू ने कुल 243 चुनावी रैलियां कीं। बीमार होने के बावजूद लालू प्रसाद ने लगभग साढ़े 11 हजार किलोमीटर सफर करके चुनावी प्रचार किया, औसतन हर दिन लगभग साढ़े तीन सौ किलोमीटर। यह पढ़ने में किसी को भी केवल आंकड़े लग सकते हैं लेकिन लालू के लिए इस सफर के हर पड़ाव में कई चेहरे अहम हैं। यह वही चेहरे हैं जिन्हें समेटकर लालू 2015 में भी किंग मेकर बने। लालू प्रसाद ने व्यक्तिगत रिश्तों की बनावट पर अपनी सियासत को गढ़ा है। उन्हें ह्यूमेन इन्वेस्टमेंट का हुनर और फायदा मालूम है।

2015 के विधानसभा चुनाव में लालू नीतीश के साथ थे। गोपालगंज के बैकुंठपुर विधानसभा सीट से सिटिंग विधायक होने के कारण जेडीयू के मंजीत सिंह का दावा था। मंजीत सिंह नीतीश कुमार के चहेते विधायकों में से एक थे लिहाजा उनका टिकट काट पाना संभव नहीं था। हालांकि लालू यादव बैकुंठपुर से गोरख यादव को आरजेडी से उम्मीदवार बनाना चाहते थे। लालू इलेक्शन मैनेजमेंट के लिए उम्मीदवारों से सीधे कम्युनिकेट करते हैं। मुझे याद है विधानसभा चुनाव हारने के बाद मंजीत सिंह ने मुझे आपबीती में सुनाया था कि कैसे लालू प्रसाद ने उन्हें सिम्बल मिलने से पहले अपने आवास पर बुलाया और पहले से वहां बैठे गोरख यादव की तरफ इशारा करते हुए मंजीत सिंह से कहा कि वह गोरख को चुनाव लड़ने दें। मंजीत सिंह तब इनकार के साथ चुप्पी साधते हुए लालू आवास से बाहर आ गए थे। लालू प्रसाद के करीबी गोरख यादव ने बैंकुठपुर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन कर दिया। मंजीत सिंह के मुताबिक उनके लिए चुनाव प्रचार पहुंचे लालू यादव ने बैंकुठपुर के मंच से किस तरह संकेतों में अपने काडर को गोरख यादव का समर्थन देने का निर्देश दिया उन्हें आज भी याद है। निर्दलीय उम्मीदवार गोरख यादव का चुनाव चिन्ह 'माला' मिला मिला था। गोरख यादव के झंडे का रंग पीला था। लालू यादव जब मंजीत सिंह के लिए चुनावी मंच पर पहुंचे तो उस दिन उन्होंने पीले रंग का गमछा कंधे पर ले रखा था। मंजीत सिंह को मंच पर माला पहनाते हुए लालू समर्थकों से बोले थे कि... मेरे माला की लाज रखना है। चुनाव में हार के बाद मंजीत सिंह को आज तक ऐसा लगता है लालू यादव ने उनके मंच से अपने करीबी गोरख यादव का समर्थन करने का संदेश दे दिया था। नतीजा यह हुआ कि बिहार भर में एकजुट महागठबंधन के वोटरों ने बैकुंठपुर में मंजीत सिंह का साथ छोड़ दिया और बीजेपी के मिथलेश तिवारी को जीत मिली। अगर मंजीत सिंह की व्यथा को सही मानिए तो लालू यादव संकेतों में सियासत करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि लालू कच्चे आम सरीखे कैडर से भी बेहतरीन जायका निकालने का हुनर रखते हैं।

तो क्या हुआ अगर लालू प्रसाद 2019 के चुनाव में बाहर नहीं रहे तो? तेजस्वी को सबसे ज्यादा परेशानियां घर के अंदर से मिल रही हैं। इसका सीधा असर उनके बॉडी लैंग्वेज पर दिख रहा है। लालू के उत्तराधिकारी के तौर पर तेजस्वी यादव तेजी से उभरकर सामने आए हैं। आरजेडी ने तेजस्वी के नेतृत्व को स्वीकार किया है लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या तेजस्वी कैडर कनेक्टिविटी के उस मुकाम पर पहुंच पाए हैं जहां उनके पिता लालू प्रसाद खड़े हैं? क्या तेजस्वी इलेक्शन मैनेजमेंट का वह स्किल दिखा पाएंगे जिसमें लालू प्रसाद को महारथ हासिल है? बेशक.. यह सब कर पाना आसान नहीं, लालू प्रसाद बन पाना तो किसी के लिए भी मुमकिन नहीं।

मौजूदा चुनाव में तेजस्वी यादव के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती भी यही रहने वाली है। महागठबंधन में सीटों का तालमेल लालू प्रसाद भले ही अपने फार्मूले से करवा दिया हो लेकिन उनके बिना इलेक्शन मैनेजमेंट की राह आसान नहीं दिखती। तेजस्वी अपनी पार्टी के नेताओं को जानते हैं, कार्यकर्ताओं को पहचानते हैं लेकिन वह लालू प्रसाद की तरह स्लीपर कैडर को एक्टिवेट करना नहीं जानते। तेजस्वी के सामने मुश्किल यह भी है कि उनका अंदाज़ लालू प्रसाद से जुदा है। लालू अपने कैडर से नतीजा लेने के लिए फटकारना भी जानते ही और पुचकारना भी। जबकि तेजस्वी का पॉलिटिकल स्टाइल सॉफ्ट दिखाई पड़ता है। जाहिर है 2019 के चुनावी रण में लालू प्रसाद की गैरमौजूदगी बड़ा असर डालेगी। लालू की गैरमौजूदगी बीजेपी और उसके गठबंधन के लिए आधी से ज्यादा जीत की तरह है।

यह लेख वरीय पत्रकार शशिभूषण के फेसबुक पोस्ट से लिया गया है। रिपब्लिक हिन्दी ने उनकी अनुमति से यह संस्मरण अपने पाठकों के लिए प्रकाशित किया है। 

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