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लालू की गैरमौजूदगी को भुनाने में जुटे हैं नीतीश कुमार

By लोकनाथ तिवारी | Publish Date: 8/6/2019 12:26:46 PM
लालू की गैरमौजूदगी को भुनाने में जुटे हैं नीतीश कुमार

रिपब्लिक हिंदी: धारा 370 हटाने के मुद्दे पर जब एनडीए के घटक ही नहीं विरोधी भी बीजेपी नेतृत्व के साथ खड़े दिखायी दे रहे हैं, बीजेपी की सहयोगी जदयू प्रमुख नीतीश अलग स्टैंड पर कायम हैं. इसके पीछे के कारणों को जानने के लिए वर्तमान परिस्थितियों और नीतीश कुमार की राजनीति को जानना जरूरी है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सारा खेल अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल करने के लिए है. ऐसे समय में जब राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालूप्रसाद यादव जेल में बंद हैं और उनका कुनबा राजनीतिक रूप से बैकफुट पर आ गया है, नीतीश उस रिक्त स्थान को पूरा करने के लिए तत्पर हो गये हैं. 

ऐसे समय में जब लालू यादव की गैर मौजूदगी में आरजेडी अपना जनाधार खोती जा रही है और अल्पसंख्यकों का उससे मोह भंग हो रहा है. ऐसे में इस समुदाय के लोग नीतीश की तरफ ही देख रहे हैं. अब जब जेडीयू अपने जनाधार के विस्तार के लिए कई रणनीतियों पर एक साथ काम कर रही है, ऐसे में नीतीश कुमार मुस्लिमों को अपने पाले में करने के इस 'गोल्डन चांस' को गंवाना नहीं चाहते. 90 के दशक में लालू यादव के रहते नीतीश अल्पसंख्यकों का भरोसा तो नहीं जीत पाए थे लेकिन अब बिहार में लालू के रिक्त स्थान को पूरा करने में नीतीश कुमार कोई कोरकसर छोड़ना नहीं चाहते. फिलहाल तो बिहार की सरकार पर इसका कोई असर नहीं होने जा रहा है, लेकिन आने वाले वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव से दो-चार महीने पहले बिहार की सियासत में हलचल हो सकती है. जाहिर है उस वक्त कोई बड़ा उलटफेर भी हो सकता है. ऐसे में जेडीयू को अल्पसंख्यकों का आधा साथ भी मिल जाता है तो यह बिहार की राजनीति को अलग दिशा देगा. जाहिर है नीतीश कुमार ने अपने लिए सभी विकल्प खुले रख छोड़े हैं.

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि जेडीयू को अपना चेहरा बचाना है, दामन साफ रखना है और मुस्लिमों के बीच में अपने आपको समुदाय का हितैषी भी बताना है. ऐसे में विरोध करना पार्टी की मजबूरी है. आर्टिकल 370 पर सीएम नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने विरोध तो किया, लेकिन एक बार फिर वो राज्य सभा से वॉकआउट कर गई. तीन तलाक के मुद्दे पर भी जेडीयू ने ऐसा ही कदम उठाया था, ऐसे में जेडीयू के एनडीए के साथ रहकर भी अलग दिखने की रणनीति को लेकर कई सवाल भी खड़े होते रहे हैं. जानकारों की मानें तो बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार दोहरी चाल चलने में माहिर खिलाड़ी हैं. यह तब और महत्पूर्ण हो गया है, जब लालू यादव की गैरमौजूदगी के कारण नीतीश के सामने 'गोल्डन चांस' आया है.

सोमवार को राज्यसभा से जेडीयू का वॉकआउट यही बताता है कि नीतीश कुमार अपने हर विकल्प खोले रखना चाहते हैं. एक तरफ अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने की कोशिश के तौर पर इसे लिया जाना चाहिए तो दूसरी ओर एनडीए में बने रहने का संदेश भी दे दिया. हालांकि, किसी जमाने में वॉकआउट विरोध का ही एक तरीका था, लेकिन आज की राजनीति में इसका मतलब समर्थन भी होता है.

विशेषज्ञों का मानना हैं कि जेडीयू को अपना चेहरा बचाना है, दामन साफ रखना है और मुस्लिमों के बीच में अपने आपको हितैषी बताना है तो विरोध करना उनकी मजबूरी है. अल्पसंख्यक वोट लेने के लिए नीतीश कुमार को यह प्रदर्शित करना होगा कि वह तीन तलाक और अनुच्छे द 370 जैसे मुद्दों पर एनडीए में रहते हुए भी भाजपा की नीतियों से अलग राय रखते हैं.

इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि नीतीश सरकार ने अब तक इस पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन जेडीयू कोटे के मंत्री श्याम रजक ने पार्टी का स्टैंड क्लीयर किया है. उन्होंने अनुच्छे्द 370 को खत्म करने को 'काला दिन' करार दिया तो एनडीए में बने रहने की भी बात कही. माना जाता है कि यही जेडीयू और नीतीश कुमार का भी स्टैंड है. ऐसे में साफ है कि नीतीश ने अपने लिए सभी विकल्प भी खुले रखे हैं. गौरतलब है कि जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, तब भी वर्ष 1996 में भी नीतीश कुमार ने अपना अलग स्टैंड रखा था. कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में अनुच्छे द 370, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर कोई समझौता नहीं करने की शर्त भी रखी थी. हालांकि, इसके पीछे भी यही वजह थी कि उन्हें अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पैठ बनानी थी.
 

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