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महालयाः पितृपक्ष की समाप्ति और मां के आगमन का पल

By Republichindi desk | Publish Date: 9/27/2019 5:39:17 PM
महालयाः पितृपक्ष की समाप्ति और मां के आगमन का पल

रिपब्लिक डेस्कः दुर्गा पूजा के शुरुआत महालया से होती है. ऐसे में महालया का विशेष महत्व है. महालया पितृ पक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष के प्रारंभ का समय होता है. महालया के दिन पितरो की तृप्ती के लिए पिण्डदान की जाती है. इस दिन हर एक घाट पर पिण्डदान के लिए लोगों की काफी भीड़ लगी रहती है. महालया पितृपक्ष के समापन का संकेत है और इसके बाद से ही नवरात्र की शुरुआत होती है. नवरात्र में मां की नौ शक्तियों की पूजा-अर्चना की जाती है.

इस दौरान मां के भक्त नौ दिन श्रद्धा भाव से देवी भक्ति में लीन हो जाते हैं. जिस बीच नौ दिनों तक घरों में मां दुर्गा की अखंड ज्योति और कलश की स्थापना की जाती है.

महालया से जुड़ी एक और मान्यता है. महालया वह समय काल है, जिसमें मां दुर्गा ने असुरों का सर्वनाश किया था. बंगाली इस दिन को बहुत महत्व देते हैं और आज भी बंगाल के कई हिस्सों में इसे धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन मां दुर्गा के पराक्रम से जुड़े नाटक किए जाते हैं, जिसमें वे असुरों का वध करती हैं.

शास्त्रों के अनुसार दुर्गा पूजा का त्योहार देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच हुए युद्ध का प्रतीक है, यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. राक्षस महिषासुर ने कई वर्षो तक तपस्या और प्रार्थना कर भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांगा. महिषासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे कई वरदान दिए लेकिन भगवान ब्रह्मा ने महिषासुर को अमर होने के वरदान की जगह यह वरदान दिया कि उसकी मृत्यु एक स्त्री के हाथों होगी. ब्रह्मा जी से यह वरदान पाकर महिषासुर काफी प्रसन्न हो गया और सोचने लगा की किसी भी स्त्री में इतनी ताकत नहीं है जो उसके प्राण ले सकें.

इसी विश्वास के साथ महिषासुर ने अपनी असुर सेना के साथ देवों के विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया जिसमें देवों की हार हो गई और सभी देवगण मदद के लिए त्रिदेव यानि भगवान शिव, ब्रह्मा और विष्णु के पास पहुंचें. तीनों देवताओं ने अपनी शक्ति से देवी दुर्गा को जन्म दिया जिसके बाद दुर्गा ने राक्षस महिषासुर से युद्ध कर उसका वध किया, तो इस तरह से महिषासुर एक स्त्री के हाथों मारा गया. इस तरह बुराई पर अच्छाई की जीत हुई. इसके अलावा इस त्योहार को फसल से जोड़कर भी देखा जाता है जो दुर्गा माता के जीवन और सृजन रूप को भी चिन्हित करता है.


 

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